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	<title>मिर्ची सेठ &#187; हिन्दी</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
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		<title>टीवी लगाओ &#8211; ग्रामीण महिला विकास बढ़ाओ</title>
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		<pubDate>Fri, 10 Aug 2007 17:32:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[लोजी अब पक्का हो गया। टीवी से भारत की ग्रामीण महिलाओं का बहुत विकास हो रहा है। अब यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की एमिली ऑस्टर तो यही कहती हैं। उन्होंने एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया है जिसका नतीजा यही है कि &#8211; भारत में गाँवों में केबल टीवी लगने के बाद चाल-चलन व रवैये में काफी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>लोजी अब पक्का हो गया। टीवी से भारत की ग्रामीण महिलाओं का बहुत विकास हो रहा है। अब यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की एमिली ऑस्टर तो यही कहती हैं। उन्होंने एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया है जिसका नतीजा यही है कि &#8211; भारत में गाँवों में केबल टीवी लगने के बाद</p>
<ul> </ul>
<ul>
<li>चाल-चलन व रवैये में काफी फर्क आया है</li>
<li>औरते इस बात पर कम सहमत होती हैं कि औरतों <strike>के प्रति घरेलू झगड़े</strike> की मारपीट सही हैं</li>
<li>वे अपनी अधिक स्वतंत्रता की बात करती हैं जैसे कि कहीं जाने से पहले किसी से पूछ कर जाना</li>
<li>पहले बच्चा लड़का ही हो इस बात पर कम झुकाव दर्शाती हैं</li>
<li>लड़कियों के स्कूलों में दाखिले में वृद्धि</li>
<li>बच्चों की पैदाइश दर में कमी</li>
</ul>
<p>आप पूरा पेपर यहाँ से <a href="http://home.uchicago.edu/~eoster/tvwomen.pdf">पढ़ सकते</a> हैं। आप इस से कितने सहमत / असहमत हैं कमेंट द्वारा जरूर बतावें। </p>
<p>ग्रामीण महिलाओं के ऊपर तो एमिली जी ने पेपर लिख दिया पर शहरी महिलाओं की जिंदगी के ऊपर फर्क पर भी बात होनी चाहिए। अभी तो घरों में रोटी सीरियलों के टाइम के हिसाब से पकती है। दूसरी तीसरी के बच्चे पूछते हैं कि पापा पापा आप मम्मी को कब डाईवोर्स दोगे इत्यादि।&nbsp;</p>
<p>साभार &#8211; <a href="http://www.marginalrevolution.com/marginalrevolution/2007/08/is-tv-good-for-.html">मारजिनल रेवोलुशन</a></p>
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		<title>मेंढक बहरा हो गया</title>
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		<pubDate>Mon, 06 Aug 2007 03:25:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[आजकल लड़के लड़कियों को स्कूलों में यौन शिक्षा दी जानी चाहिए या नहीं पर बहस का बाजार गरम हो रहा है। सदैव मुस्कुराते शास्त्री जी ने पहले सर्व किया व नेशन-मास्टर के आंकड़ों को दिखाते हुए मत रखा कि देखिए इन पश्चिम वालों को &#8211; पिछले 50 सालों से शिक्षा दे रहे हैं पर कुछ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आजकल लड़के लड़कियों को स्कूलों में यौन शिक्षा दी जानी चाहिए या नहीं पर बहस का बाजार गरम हो रहा है। सदैव मुस्कुराते शास्त्री जी ने पहले <a href="http://sarathi.info/archives/447">सर्व किया</a> व नेशन-मास्टर के आंकड़ों को दिखाते हुए मत रखा कि देखिए इन पश्चिम वालों को &#8211; पिछले 50 सालों से शिक्षा दे रहे हैं पर कुछ फायदा नहीं हुआ दिखता। उलटे ब्लात्कार व यौन संबंधित अपराध बड़े ही हैं। यानि की यौन शिक्षा का लंबे समय से चलता आ रहा प्रयोग असफल। </p>
<p>शास्त्री जी के सर्व के जवाब में नीरज भाई रोहिल्ला ने बढ़िया <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Serve_and_volley">वॉली</a> की व <a href="http://antardhwani.blogspot.com/2007/08/blog-post.html">अपनी दो टूक</a> रखी। कि आंकड़ो-वांकड़ों से तो कुछ भी कहा जा सकता है। यौन शिक्षा दे रहे हैं इस लिए अपराध बढ़ रहे हैं कहना गलत होगा। नीरज जी के इस लॉजिक से में एक दम सहमत हूँ। अंग्रेजी में हिसाब व विज्ञान वालों के बीच एक कहावत चलती है &#8211; Correlation is not causation &#8211; यानि दो चीजों के परस्पर संबंध होने से कारण का होना पता नहीं चलता।&nbsp;एक कहानी&nbsp;सुनाता हूँ ज्यादा समझ में आएगा</p>
<blockquote><p>पिंटू भाई वैज्ञानिक&nbsp;बड़े खुराफाती आदमी थे। जानवरों के साथ तरह तरह के पंगे वाले प्रयोग करते रहते थे।&nbsp;बगल के तालाब से एक मेंढक पकड़&nbsp;लाए सोचे कि आज इस पर प्रयोग करेंगे। प्रयोगशाला में जाकर उसे कुछ धागों वगैरह से बांधा व&nbsp;फिर जोर से ताली बजाई -&nbsp;मेंढक&nbsp;जोर से उछला। फिर पिंटू भाई ने सर्जिकल ब्लेड लिया व&nbsp;चार में से एक टांग काट दी। फिर ताली बजाई। मेंढक फिर से उछला। अभी एक और टांग काट दी व ताली बजाई। मेंढक दो टांगों से जितना उछला सकता था उछला। अभी एक टांग और काट दी व ताली बजाई। मेंढक थोड़ा सा हिला। अभी पिंटू भाई ने रही सही एक टांग भी काट दी व इस बार फिर से ताली बजाई। मेंढक बिल्कुल न उछला। </p>
<p><strong>प्रयोग का नतीजा</strong> &#8211; मेंढक की चारों टांगे काटने से मेंढक बहरा हो जाता है</p>
<p>&nbsp;</p>
</blockquote>
<p><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="164" src="http://pnarula.com/images/ms/e6b92f06940e_11F29/image07.png" width="469" border="0"/> </p>
<p>अभी यौन शिक्षा के क्या नफे-नुक्सान हैं व भारत के परिपेक्ष में इसके क्या मायने हैं यह लम्बी बहस का मुद्दा है देखतें हैं हिन्दी जाल जगत में इस बारे में और लोग क्या कहते हैं।</p>
<p>छवि साभार &#8211; <a href="http://www.deviantart.com/deviation/20711528/?qo=39&amp;q=frog&amp;qh=boost%3Apopular+age_sigma%3A24h+age_scale%3A5">नारदक</a></p>
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		<item>
		<title>यदि भारत अमरीका हो जाए तो &#8211; श्वते-श्याम एडिशन</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Aug 2007 18:05:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>
		<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई &#8211; अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” प्रविष्टियां लिख डाली। बड़ी सी पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[</p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/7a8aa7ded6d3_9BFE/image03.png" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="79" src="http://pnarula.com/images/ms/7a8aa7ded6d3_9BFE/image0_thumb1.png" width="163" align="right" border="0"/></a> आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई &#8211; अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” <a href="http://www.akshargram.com/2007/07/31/636/">प्रविष्टियां</a> लिख डाली। बड़ी सी पर जोर इस लिए दे रहा हूँ कि आलोक अपनी कम लिखे को ज्यादा समझना – तार को खते समझना जैसी ब्लॉग पोस्टों के लिए <strike>बदनाम</strike> प्रसिद्ध हैं। खैर अगर ऐसी कोई बात है तो मैं आलोक से इस खाने वाली चीज के बारे में जरुर जानना चाहुंगा। श्रीमती जी कैमिस्ट्री की रिसर्च-स्नातक हैं उनसे कह कर इस चीज के अंदर के विटामिन निकलवाकर – बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे।  </p>
<p>वैसे लिखना तो आलोक को पहले चाहिए था कि अमरीका उन्हें कैसा लगा। वैसा ही जैसा वे सोचते था या अलग। पर उन्होंने अपनी सोच की छिपकली सभी पर छोड़ दी अभी भाई लोग अनुगूंज में सोच सोच कर लिख रहे हैं। अब बड़े भाई ने कहा है तो लिखना तो पड़ेगा ही। तो लीजिए हमारी भी श्वेत-श्याम आहुति इस <a href="http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/">22वीं अनुगूंज</a> में। <span id="more-186"></span></p>
<p><strong>श्वेत संस्करण</strong> </p>
<p>जे कर अपणा भारत अमरीका बण जावे ते भाई घणा मजा आवे। सिस्टम काम करने लगेगा। बाबू भाई दफ्तर वाले बिना रिश्वत लिए ठीक टाइम पर बिना भाव खाए काम करने लगेगें। लोग बाग अपने शहर को अपना शहर समझने लगेंगे। कूड़ा कूड़े दानों में ही फैंकेगे व बस, रेलगाड़ी, राशन की दुकानों में आराम से बिना भगदड़ मजाए लाइन से लगेंगे। शहरों में सुंदर सुंदर पार्क होंगे व किताबों से भरी सार्वजनिक लाइब्रेरियां होंगी। नलों में हर समय पानी आएगा व बिजली साल छमाही में एक बार बता कर जाएगी। सड़के, गली के बल्ब एक निश्चित समय पर मरम्मत कीए जाएंगे न कि जब तक चल रहे हैं चलने दो जब टूट जाएंगे तो ठीक करेंगे। अदालते समय रहते काम करेंगी व सरकार लोगों की जिंदगी में थोड़ा कम दखल देगी। लाइसेंस राज और ज्यादा काबू में किया जाएगा। सरकार के खर्चे पारदर्शी होंगे।  </p>
<p><strong>श्याम संस्करण</strong> </p>
<p>भाई जे कर भारत ना अमरीका बण गयो – घणो मुसीबत आ जावे। डाक्टर पर जाणे से पहले लोग सो बार सोचें। ये नहीं कि जब मन किया चले गए। डाक्टर के पास जाने के बाद इंश्योरस वालों से लड़ें कि ये खर्चा कवर नहीं किया मैं इसके पैसे क्यूं दूं जब इंश्योरंस का प्रीमियम देता हूँ। बाप बेटे के बड़े होने पर सोचे की यार ये बाहर क्यूं नहीं जाता और घर पर रह रहा है तो किराया देना शुरु करे। पार्टी में जाएं तो आप का दोस्त अपने परिवार से कुछ इस तरह मिलवाए – यह है मेरी तीसरी बीवी, ये बिल्लू पिंकी मेरे बच्चे है, घसीटा मेरी बीवी का सुपुत्र है व ये टिनटिन हमदोनों की बेटी है। आदमी उमर के तकाज़े भूलने लगे – सात साल का बच्चा साठ साल के आदमी को नाम से पुकारे, साठ साल की आंटी टम्मी टक व ब्रेस्ट आग्यूमेंट कराकर कल्बों में प्राउल पर निकले। पूरे देश में सामान खरीदने की गिन 30-40 तरह की दुकाने होंगी। जहाँ जाइए हर जगह आप को टारगेट, कोल्स, बेस्ट बॉय, सर्किट सिटी, वालमार्ट मिल जाएगा। कोई विविधता नहीँ। मदरास की साड़िया, मथुरा के पेड़े, पंजाब का साग व गुजरात का खाकरा क्या होता है भाई।  </p>
<p>आज के लिए इतना ही। </p>
]]></content:encoded>
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		<title>मिलना हिन्दी के पहले स्पाइडर मैन से</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Jul 2007 20:45:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ दिन पहले सौतन के बेटे (मेरा मोबाइल जिस पर ईमेल आती है) ने आलोक का कम-लिखे-को-ज्यादा समझने वाला संदेश दिया कि “भई हम आपके देश में है, समय मिले तो फोन कीजिएगा”। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं कि चलिए आखिरकार आलोक से मिलना हो पाएगा। आलोक भाई ने अंतर्जाल पर हिन्दी का पहला जाल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[</p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/mirchialok2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="189" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/mirchialok_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a>  </p>
<p>कुछ दिन पहले <a href="http://ms.pnarula.com/200703/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%80/">सौतन के बेटे</a> (मेरा मोबाइल जिस पर ईमेल आती है) ने <a href="http://devanaagarii.net/hi/alok/blog/">आलोक</a> का कम-लिखे-को-ज्यादा समझने वाला संदेश दिया कि “भई हम आपके देश में है, समय मिले तो फोन कीजिएगा”। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं कि चलिए आखिरकार आलोक से मिलना हो पाएगा। आलोक भाई ने अंतर्जाल पर हिन्दी का पहला जाल बिछाया था तो इस नजर से वे हैं हिन्दी के पहले स्पाइडर मैन साथ ही वे मेरे कॉलेज के सुपर सीनियर (जिनसे आप कॉलेज में न मिले हों) भी हैं इसलिए बाते भी करने को काफी होंगी। </p>
<p>फोन लगाया तो पता लगा कि वे सिलिकन वैली पधार रहे हैं व गूगल वालों से भी मिलेंगे। भई वाह हम पड़ोस में रहते हैं पर आजतक उन लोगों से हिन्दी के बारे में बात करने नहीं गए। आलोक भाई उनसे मिले भी व उनसे हिन्दी के बारे में चर्चा भी की। इस बारे में आगे लिखूंगा। वहाँ गूगल वालों ने क्या खिलाया यह तो वे स्वयं ही बताएंगे। खैर फोन पर तय हुआ कि हम लोग साथ साथ सैन होज़े से करीब 160 किलोमीटर दूर <a href="http://www.nps.gov/pore/">पोआंइट रियज़</a> नामक जगह पर जाएंगे। यह एक राष्ट्रीय पार्क है व वहां एक बहुत ही सुंदर लाइटहाउस भी है। <span id="more-181"></span> </p>
<p>इतवार की सुबह वसुधा व मैं आलोक सपरिवार जिस होटल में वह ठहरे थे वहाँ पहुंच गए।&nbsp; <a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ggday4.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="240" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ggday_thumb2.jpg" width="159" align="right" border="0"/></a>वसुधा व भाभी जी पीछे के सीट पर बैठीं व अपनी – शॉपिंग-पति-रसोई-मेकअप की बातों में ऐसी खोई की लगा वे बरसो से एक दूसरे को जानती हैं। बीच में हिन्दी चिट्ठाकारों की पत्नी होने का गम भी निकलकर आया। आलोक व मैं हाईवे 101 पर बतियाते हुए ड्राइव कर रहे थे। रास्ते में गोलडन गेट ब्रिज जो कि सैन फ्रांसिस्को की शान है भी आया व उसका रंग सुनहरा न हो कर बहुत कुछ जंग जैसे रंग का है तो इस बात पर बहस हो गई कि इसका नाम रस्टी ब्रिज होना चाहिए। मैंने कहा कि फिर कौन इसे देखने आएगा। खैर इस बातचीत में हाइवे वन को मिस कर गए व उससे करीब 15-16 किलोमीटर आगे निकल गए। खैर अपने को कौन सा वहाँ जल्दी थी पहुंचने की। गाड़ी वापिस घुमाई व सौतन के बेटे में चल रहे इंटरनेट से दूबारा से रास्ता मैप किया। मजे की बात है जहां से गाड़ी वापिस की वह एक फयूनरल होम, यानि मुर्दाघर था। हमने चिकाई कि भैया देखो जहां से लोग वापिस नहीं आते वहां से वापिस ले कर जा रहाँ हूँ। </p>
<p>ग्यारह बजे तक हम अपनी मंजिल पर पहुंच गए। लाइट हाउस पहुंचने के लिए 300 से ज्यादा सीढ़ियाँ उतरनी थी यानि की करीब करीब 30 मंजिला इमारत पर चढ़ना व उतरना। जै माता दी कह कर उतरे व वाकई बहुत खूबसूरत जगह थी। उतरते वक्त बादलों से होकर गुजरे। ऊपर जहाँ से उतराई शुरु की थी वहाँ इतनी हवा चलती थी कि लगभग सभी पेड़ एक तरफ झुक चुके थे। रास्ते में पहली बार लाल रंग की काई भी देखी। वहाँ लोगों से पता चला कि किस्मत अच्छी हो तो लाइटहाउस से कई बार व्हेल मछलियाँ भी नजर आती हैं। </p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/lalkaai2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="270" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/lalkaai_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a>  </p>
<p>इसके बात वापिसी की यात्रा शुरु हुई। रास्ते में हिन्दी व जालजगत पर बातें हुई। पहले गूगल के बारे में। आलोक ने बताया कि वहां से पता चला कि लोग अंग्रेजी शब्दों (मेरे ख्याल से यहाँ उन्नत देशों से आने वाली खोजों की बात होनी चाहिए) में करोड़ों खोजे करते हैं पर बाकी सभी अन्य भाषायों कि मिला कर भी 50000 से ज्यादा खोजे नहीं होती। अगर इस तरह से सोचें तो जितना गूगल ने हिन्दी के लिए किया उतना और किसी भी कम्पनी ने नहीं किया। फिर बात हुई हिन्दी में आ रहे नए एग्र<br />
ीगेटर व नए सजालों के बारे में। जिस पर हम दोनों का ही मानना है कि <strong>अभी हमारी कम्यूनटी इतनी छोटी है कि जितनी नई चीजे आए उतना अच्छा। हमें इसे </strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Zero-sum"><strong>जीरो सम</strong></a><strong> गेम नहीं समझना चाहिए। कि अगर किसी एक का फायदा हो रहा है तो पक्का दूसरे का नुकसान होगा। हम दोनों ने माना कि जितने नए टूल / सजाल आएंगे पाई बंटेगी नहीं ज्यादा बड़ी होगी।</strong> फिर आलोक ने अपने <a href="http://dmoz.org/World/Hindi/">डीमोज</a> का संपादक होने से संबधित अनुभवों के बारे में बताया।  </p>
<p>यही बातें करते रास्ता बढ़िया कट रहा था कि मेरी श्रीमती जी को मोशन सिकनेस हो ग<a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ambercafe3.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="84" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ambercafe_thumb1.jpg" width="164" align="right" border="0"/></a>ई व&nbsp; उन्होंने कहा कि वे आगे वाली सीट पर आ कर बैठेंगी। इस तरह से हमारी तकनीकी बातों को ब्रेक मिली व आलोक जी पिछली सीट पर चले गए। अगले दस मिनट में कार में मेरे अलावा सभी लोग सो गए व मैंने नींद भगाने के लिए गाने गाने शुरु कर दिए। अच्छी बात है कि लोग गहरी नींद में थे नहीं तो वहीं गाड़ी रुकवा कर उतर जाते कि भाई इतना बेसुरा सुनने से अच्छा है कि पैदल चला जाए। करीब तीन बजे हम लोग वापिस सिलिकन वैली पहुंचे व सीधा <a href="http://www.amber-india.com/cafe/cafe.swf">अम्बर कैफे</a> में जाकर आलू-पूड़ी, छोले भटूरे, बैंगन-टमाटर का पिज्जा व सीख कबाब ऑडर किए व एक बढ़िया सफर का अंत हुआ।  </p>
<p>जाते जाते पोआंइट रियज़ के लाइटहाउस की फोटू। यह धूंधली नहीं है बल्कि बादलों से घिरी है। </p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ptreyeslighthouse2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="182" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ptreyeslighthouse_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a></p>
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		<title>सफारी अब विंडोज़ पर</title>
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		<pubDate>Mon, 11 Jun 2007 21:33:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[लीजिए जनाब यदि आप अभी तक ऐप्पल के सफारी नामक ब्राउजर का उपयोग करना चाहते थे लेकिन ऐप्पल न होने की वजह से न कर पाए हों तो अब आप कर सकते हैं। आज यहाँ सुबह सैन फ्रांसिस्को में स्टीव जॉब्स ने सफारी ब्राउजर के विंडोज़ पर उपलब्ध होने की घोषणा की। आप इसे यहाँ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>लीजिए जनाब यदि आप अभी तक ऐप्पल के सफारी नामक ब्राउजर का उपयोग करना चाहते थे लेकिन ऐप्पल न होने की वजह से न कर पाए हों तो अब आप कर सकते हैं। आज यहाँ सुबह सैन फ्रांसिस्को में स्टीव जॉब्स ने सफारी ब्राउजर के विंडोज़ पर <a href="http://pnarula.com/200706/safari-for-windows-and-wwdc07/">उपलब्ध</a> होने की घोषणा की। आप इसे यहाँ से <a href="http://apple.com/safari">डाउनलोड</a> कर सकते हैं। मैंने इस पर मिर्ची सेठ पर जाकर देखा व सरसरी तौर पर दो चीजें नोट की </p>
<ol>
<li>यू आर एल यानि इंटरनेट पते में हिन्दी अच्छे तरीके से दिखाई गई है। मिर्ची सेठ में प्रविष्टि का आखिरी हिस्सा हमेंशा हिन्दी में होता है। भाई लोगो ने बहुत कहा कि आपके पते सभी ब्राउजर कुछ ऐसे दिखाते हैं</li>
</ol>
<p><a title="http://ms.pnarula.com/200706/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%8f%e0%a4%9f%e0%a4%bf/" href="http://ms.pnarula.com/200706/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%8f%e0%a4%9f%e0%a4%bf/">http://ms.pnarula.com/200706/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%8f%e0%a4%9f%e0%a4%bf/</a></p>
<p>पर अब सफारी में यह ठीक नजर आते हैं</p>
<p>2. लगता है सफारी के हिन्दी रेंडरिंग इंजिन में कुछ पंगा है क्यूंकि यह मात्राओं व आधे अक्षरों के साथ नाइंसाफी कर रहा है। नीचे की छवि में देखिए। </p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/34b25eb265ec_CD03/safarionwindows2.png" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="327" src="http://pnarula.com/images/ms/34b25eb265ec_CD03/safarionwindows_thumb.png" width="481" border="0"/></a></p>
<p>मुझे विश्वास है कि हिन्दी&nbsp;चिट्ठाकार इन नए&nbsp;ब्राउजर को अच्छी तरह से परख कर अपनी अपनी रिपोर्ट भी देंगे।&nbsp;</p>
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		<title>ये कम्पयूटर वालों को इतने पैसे क्यों मिलते हैं?</title>
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		<pubDate>Fri, 27 Apr 2007 07:55:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[पैसा]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले नौं साल से कम्पयूटर इंडस्टरी में काम कर रहा हूँ व उस से भी ज्यादा देर से इसके बारे में जानता हूँ। काफी बार यह प्रश्न दिमाग में आता है कि ये मार्किट कम्पयूटर ज्ञान को इतनी तवज्जो क्यों देती है?&#160;आज के दौर में&#160;एक साथ इतने सारे लोगों को बाकी&#160;लोगों से&#160;औसतन&#160;ज्यादा पैसे देने वाली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले नौं साल से कम्पयूटर इंडस्टरी में काम कर रहा हूँ व उस से भी ज्यादा देर से इसके बारे में जानता हूँ। काफी बार यह प्रश्न दिमाग में आता है कि ये मार्किट कम्पयूटर ज्ञान को इतनी तवज्जो क्यों देती है?&nbsp;आज के दौर में&nbsp;एक साथ इतने सारे लोगों को बाकी&nbsp;लोगों से&nbsp;औसतन&nbsp;ज्यादा पैसे देने वाली इंडस्टरी&nbsp;शायद&nbsp;कम्पयूटर&nbsp;ही है।</p>
<p>इस प्रश्न का जवाब यदि एक शब्द में देना हो तो वह है इनोवेशन&nbsp;या नवोत्पाद। अब यदि एक तरफ&nbsp;आप&nbsp;मारुति में मशीन के पास काम करने वाला&nbsp;वर्कर लें और दूसरी तरफ इंफोसिस में काम करने वाला वर्कर लें तो दोनों में क्या अंतर पाएंगे। मारूति वाले आदमी का काम पूरी तरह से निर्धारित है। हर रोज उसे गिन चुने काम पहले से निर्धारित प्रक्रिया से पूरे करने हैं। वहीं दूसरी तरफ इंफोसिस वाले आदमी को हर चार पाँच महीने में नए प्रोजेक्ट पर काम करना है। हर जगह कुछ न कुछ नया करना है। हो सकता है उसे नए प्रोग्राम लिखने हों और अच्छा प्रोग्राम लिखना व कविता लिखना बराबर ही है। हो सकता है उसे क्लाइंट के वातावरण के हिसाब से कुछ नया लगाना हो।</p>
<p>तो बस यही छोटी सी बात है कि आप&nbsp;किसी&nbsp;काम के लिए पहले से निर्धारित प्रक्रिया से काम करते हैं या आपको यह बार बार बदलनी पड़ती है निर्धारित करता है कि मार्किट आप के काम की क्या कीमत लगाती है।</p>
<div class="wlWriterSmartContent" id="0767317B-992E-4b12-91E0-4F059A8CECA8:6435b974-cc62-42d6-8407-9effa3b5d5a2" contenteditable="false" style="padding-right: 0px; display: inline; padding-left: 0px; padding-bottom: 0px; margin: 0px; padding-top: 0px">Technorati tags: <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80" rel="tag">हिन्दी</a>, <a href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a5%87%20%e0%a4%b9%e0%a5%80" rel="tag">ऐसे ही</a></div>
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		<title>देर से पहुंचती मनु संतानें</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 21:13:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने के अलावा एक और बात जो लगभग सभी जगह देसीभाईयों में एकरस देखने को मिलती है कि अपन लोग समय की कदर बहुत कम करते हैं। मीटिंग मे बहुधा लेट पहुंचते हैं और यदि मीटिंग सुबह के 8 बजे हुई तो समझ लो बज गई घंटी।</p>
<p>यह बात सिर्फ मीटिंग तक ही सीमित नहीं है। अपने सभी कार्यकर्म शादी-ब्याह पर पहुँचना, बच्चों की शिक्षक-अभिभावक मीटिंग, पिकनिक के लिए सुबह निकलना सब के सब एक आई एस टी यानि इंडियन स्टैंड्रड टाईम रोग से पीड़ित हैं। हालत यह है कि इसे अपने आचार विहार का अंग मान लिया गया है कि भैया हम तो ऐसे ही हैं। इंडियन स्टैंड्रड टाइम के हिसाब से 30 से 60 मिनट लेट ही पहुंचेगे। यह मैं अपने अमरीका में रहे पिछले 8-9 सालों के अपने व यहाँ देसी बिरादरी को देखते हुए लिख रहा हूँ। शायद देश में भी ऐसा ही हो। इस बारे में टिप्पणी में बताएं।</p>
<p>हम ऐसे कैसे हो यह मैं नहीं जानता पर शायद यह बिमारी नई ही है। अपने बड़े बूढ़ों को देखता हूँ तो सभी सुबह जल्दी उठने वाले व जल्दी सोने वालों में से हैं। अपनी नसल उल्टी है देर से सोती है व देर से उठती है। अब कौन सही है कौन गलत यह तो दर्शन का विषय है पर यह बात पक्की है कि समय की कद्र करनी चाहिए खासकर ऐसी जगहों पर जहाँ आप बहुत से देशों के लोगों के साथ काम कर रहे हों क्यूंकि आपसे आप के देश की पहचान होती है और आप यह तो न चाहेंगे कि मनुपुत्र जिनके बारे में दिनकर जी ने निम्न कविता लिखी थी दुनिया में आलसी लेटलतीफ के नाम से प्रसिद्ध हो</p>
<blockquote><p><strong>मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br />बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</strong></p>
</blockquote>
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		<title>काला बुखारा मोती</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Mar 2007 22:02:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[यायावारी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले महीने एक खिलौना खरीदा इतना पसंद है कि श्रीमती जी का कहना है कि पहले लैपटॉप सौतन थी अब यह सौतन का बच्चा आ गया है। तो बताईए क्या। यदि आपने बता दिया कि मैं किसके बारे में बात कर रहा हूँ तो इसके बारे में आगे लिखेंगे।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले महीने एक खिलौना खरीदा इतना पसंद है कि श्रीमती जी का कहना है कि पहले लैपटॉप सौतन थी अब यह सौतन का बच्चा आ गया है। तो बताईए क्या। यदि आपने बता दिया कि मैं किसके बारे में बात कर रहा हूँ तो इसके बारे में आगे लिखेंगे।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>अमरीकी बनिया बुद्धि व समय</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Mar 2007 00:25:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[कहते हैं समय बड़ा बलवान, पर भाई मेरे ख्याल से अमरीकी समय से भी बलवान हैं। हर साल दो बार समय बदल देते हैं। मेरा इशारा है &#8220;डे-लाइट सेविंग्स&#8221;&#160;की तरफ।&#160;अभी आज सुबह&#160;समय एक घंटा आगे हो&#160;गया&#160;यानि कि स्प्रिंग अहेड&#160;या फिर&#160;बसंत&#160;उछाल।&#160;बसंत के आते ही सूरज&#160;थोड़ा पहले उगना&#160;शुरु हो जाता है व ज्यादा देर तक रोशनी रहती [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कहते हैं समय बड़ा बलवान, पर भाई मेरे ख्याल से अमरीकी समय से भी बलवान हैं। हर साल दो बार समय बदल देते हैं। मेरा इशारा है &#8220;डे-लाइट सेविंग्स&#8221;<a href="http://pnarula.com/images/ms/65f462278094_F4EB/springahead4.png" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="142" src="http://pnarula.com/images/ms/65f462278094_F4EB/springahead_thumb2.png" width="300" align="right" border="0"/></a>&nbsp;की तरफ।&nbsp;अभी आज सुबह&nbsp;समय एक घंटा आगे हो&nbsp;गया&nbsp;यानि कि स्प्रिंग अहेड&nbsp;या फिर&nbsp;बसंत&nbsp;उछाल।&nbsp;बसंत के आते ही सूरज&nbsp;थोड़ा पहले उगना&nbsp;शुरु हो जाता है व ज्यादा देर तक रोशनी रहती है।&nbsp;समय एक घंटा&nbsp;आगे करने से आप&nbsp;पुराने समय के हिसाब से&nbsp;सात बजे उठेंगे&nbsp;जबकि समय होगा आठ। हाय राम एक&nbsp;घंटा कहां गया। देसी भाईयों को इससे बड़ी परेशानी होती है। एक भाई तो अपना समय ही ठीक नहीं करता।</p>
<p>अब आते हैं बनिया बुद्धि पर। आम धारणा है कि इस मुई डे-लाइट सेविंग्स के पीछे बिजली बचाने का कारण है कि। लेकिन पते की बात है कि अगर लोग ज्यादा जल्दी घर वापिस जाएंगे तो वे खरीदारी करने बाहर निकलेंगे या फिर गोल्फ वगैरह खेलेंगे। अब ऐसा होगा तो कितने धंधों को फायदा होगा। बस इसी के चलते यह कहानी हर साल होती है।</p>
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		<title>हाँ भाई से किसने किए सवाल</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Feb 2007 06:12:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[श्रीश जी के पिंग ने चिट्ठाजगत की दुनिया में फैली महामारी से परिचित कराया। पता लगा कि दिग्गज लोग नए नए तरीके से मल्टी लेवल मारक्टिंग की तरह अपने मित्रों को इस महामारी की चपेट में ला रहे हैं। मजे की बात है कि पहली बार मल्टी लेवल मार्कटिंग पसंद आ रही है। कत्ल होने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>श्रीश जी के <a href="http://epandit.blogspot.com/2007/02/game-of-tagging-and-15-questions.html" target="_blank">पिंग</a> ने चिट्ठाजगत की दुनिया में फैली महामारी से परिचित कराया। पता लगा कि दिग्गज लोग नए नए तरीके से मल्टी लेवल मारक्टिंग की तरह अपने मित्रों को इस महामारी की चपेट में ला रहे हैं। मजे की बात है कि पहली बार मल्टी लेवल मार्कटिंग पसंद आ रही है। कत्ल होने वाले अपने कत्ल से खुश हैं और यही नहीं कातिल का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। वाह री ब्लागिंग। चलिए अब जब इस महफिल में आ ही गए हैं तो ये काम भी कर लेते हैं। सवाल कुछ ऐसे थे कि जवाबों के लिए दो तीन साल वापिस जाना पड़ा। हाँ भाई के पुराने किस्से याद दिलाने के लिए श्रीश भाई का शुक्रिया। मेरे जवाब&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px; font-weight: bold">१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">हिन्दी ब्लॉगजगत में लिखी मेरी पहली प्रविष्टि &quot;<a href="http://haanbhai.blogspot.com/2004/02/blog-post_08.html" target="_blank">एक और खरबूजा</a>&quot; में इस बारे में फरवरी 8, 2004 लिखा था&nbsp; &#8211; भई net पर बहुत खरबूज़े हैं और खरबूज़े को देख कर खरबूज़ा रंग ना बदले ये तो हो ही नहीं सकता । तो हमने भी बिरादरी भाईयों को देख कर ब्लोग लिखना शुरू कर दिया । हनुमान जी के एक भगत ने बड़ा सुन्दर <a href="http://haanbhai.blogspot.com/www.geocities.com/hanu_man_ji/">program तख्ती</a> लिखा हुआ था बड़ा काम आया । आखिरी बार तख्ती चौथी कक्षा में लिखी थी (१९८३-१९८४) । वो भी सही दिन थे खड़िया से सुबह सुबह तख्ती पोत कर स्कूल जाते जाते तख्ती का सूखाना ।</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">२. <span style="font-weight: bold">आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा</span>, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?(आलोक जी के लिए इस प्रश्न का संस्करण &#8211; हिन्दी में चिट्ठाकारी का विचार कैसे आया, ऐसा करते हुए मन में क्या ख्याल थे और बिना किसी मदद के शुरुआत कैसे की उस समय ?)</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">क्या किस्मत पाई है। लगता है श्रीश ने मेरा पुराना चिट्ठा पढ़ कर ही प्रश्न लिखे थे। इस प्रश्न का जवाब भी &quot; <a href="http://haanbhai.blogspot.com/2004/03/blog-post_14.html" target="_blank">कहाँ से आयो गोपाल</a>&quot; से चिपका रहा हूँ &#8211; याद नहीं चिट्ठाकारी की दुनिया में कदम कैसे रखे । शायद <a href="http://weblog.infoworld.com/udell/">जॉन ऊडॅल का रेडिया   </a> मैंने सबसे पहले पढ़ा होगा । जावा से रोज़ी रोटी चलती है, इसलिए jroller.com पढ़ना शुरू हो गया । वहाँ एक <a href="http://blog.pnarula.com/">ब्लॉग</a> towards more light&#8230; लिखना आरंभ किया लेकिन वहाँ पूर्णतयः जावा केंद्रित होने के कारण निरंतरता नहीं बन पाई । इसी बीच गूगल भैया ने <a href="http://devanaagarii.net/hi/alok/blog/">आलोक</a> जी के चिट्ठे पर पटक कर हिंदी चिट्ठीकारिता से परिचित कराया और हाँ भाई का जन्म हुआ । तो ये हुआ गोपाल का आना ।&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">३.<span style="font-weight: bold"> चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? </span>आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये <img src='http://ms.pankajnarula.webfactional.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';-)' class='wp-smiley' />  क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है ?</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">हर व्यक्ति की कुछ न कुछ विशेषता होती है वह अपने आप को किसी न किसी चीज का माहिर मानता है। बचपन से ही नाम कम्पूटर बाबा व लेखू दे दिया गया था। समझ ही गए होंगे अन्य लाखों भारतीयों के तरह कम्पयूटर में हाथ तनिक साफ है। माँ बाप ने मार पीट कर भारतीयता भी ऐसी डाली है कि अमरीकियों का हिन्दी के वैज्ञानिक होने पर दिमाग चाट रहे होते हैं। कम्पयूटर पर हिन्दी की कमी खलती थी। जब सुशा फांट का 96-97 में आगमन हुआ था तो गर्मी की धूप में साइकिल चलाकर बस स्टैंड से <a href="http://www.pcquest.com/" target="_blank">पी सी क्वेस्ट</a> खरीदने पहुंच गए थे। आलोक से हिन्दी यूनिकोड सीखने के बाद हिन्दी लिखना अपने आप में एक आनंद था। फिर अलग अलग चीजों (मूवेबल टाईप, वर्डप्रैस, सर्वज्ञ, अक्षरग्राम, निपुण, नारद इत्यादि) को हिन्दी में लगाने में अगले दो साल बीत गए।&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">इन सब बातों को सोचते हूए सोचता हूँ तो मेरे लिए छपास पीड़ा शांत करना तो नहीं रहा। एक तकनीकी चैलेंज, संजाल पर हिन्दी प्रेमियों का समूह खड़ा करना, नए नए भाईयों जैसे मित्र बनाना ज्यादा बड़ी बात रही। टिप्पणियों के मोह से परे नहीं हूँ। पता नहीं फुरसतिया जी ने कहा था या जीतू भाई ने पर बात बहुत पते की थी टिप्पणी तो प्रविष्टि की बिंदी की तरह हैं जिस के बिना प्रविष्टि का माथा सूना सा लगता है।&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">४. <span style="font-weight: bold">अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, </span>यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">सिर्फ एक &#8211; आठवीं से लेकर बाहरवीं तक जेल जैसे हॉस्टल में कटी हैं। स्कूल व हॉस्टल एक ही कैम्पस में थे। महीने में सिर्फ एक बार ही बाहर जाने दिया जाता था। पर आजाद पंछी कहाँ रुकते हैं। हम लोगों ने कई गुप्त रास्ते बाहर जाने के बना रखे थे। हफ्ते में कम से कम एक बार बाहर भाग कर सर्दियों की सुबह रेहड़ी वाले से आलू के पराँठे खाने का मजा ही कुछ ओर था। ऐसे ही एक दिन वापिस आ रहे थे। वापिस आने के लिए आठ फुट की दिवार पर लगी दो फुट की कंटीली तार के नीचे से आना होता था। मैं दिवार के सर पर एक टाँग कैम्पस के बाहर और एक अंदर किए पेट के बल बैठा अंदर आने के लिए छलांग लगाने वाला था की नीचे से प्रिंसिपल सर आ गए। उनके बहुत कहने पर भी नीचे नहीं उतरा। उनके जाने के आधे घंटे बाद नीचे उतरा। कहने की जरुरत नहीं कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ।&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी ?</p>
<p style="margin-left: 40px">&nbsp;</p>
<p style="margin-left: 40px">सभी लोग शिक्षित हों।&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
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