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	<title>मिर्ची सेठ &#187; यायावारी</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
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		<title>मिलना हिन्दी के पहले स्पाइडर मैन से</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Jul 2007 20:45:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ दिन पहले सौतन के बेटे (मेरा मोबाइल जिस पर ईमेल आती है) ने आलोक का कम-लिखे-को-ज्यादा समझने वाला संदेश दिया कि “भई हम आपके देश में है, समय मिले तो फोन कीजिएगा”। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं कि चलिए आखिरकार आलोक से मिलना हो पाएगा। आलोक भाई ने अंतर्जाल पर हिन्दी का पहला जाल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[</p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/mirchialok2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="189" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/mirchialok_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a>  </p>
<p>कुछ दिन पहले <a href="http://ms.pnarula.com/200703/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%80/">सौतन के बेटे</a> (मेरा मोबाइल जिस पर ईमेल आती है) ने <a href="http://devanaagarii.net/hi/alok/blog/">आलोक</a> का कम-लिखे-को-ज्यादा समझने वाला संदेश दिया कि “भई हम आपके देश में है, समय मिले तो फोन कीजिएगा”। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं कि चलिए आखिरकार आलोक से मिलना हो पाएगा। आलोक भाई ने अंतर्जाल पर हिन्दी का पहला जाल बिछाया था तो इस नजर से वे हैं हिन्दी के पहले स्पाइडर मैन साथ ही वे मेरे कॉलेज के सुपर सीनियर (जिनसे आप कॉलेज में न मिले हों) भी हैं इसलिए बाते भी करने को काफी होंगी। </p>
<p>फोन लगाया तो पता लगा कि वे सिलिकन वैली पधार रहे हैं व गूगल वालों से भी मिलेंगे। भई वाह हम पड़ोस में रहते हैं पर आजतक उन लोगों से हिन्दी के बारे में बात करने नहीं गए। आलोक भाई उनसे मिले भी व उनसे हिन्दी के बारे में चर्चा भी की। इस बारे में आगे लिखूंगा। वहाँ गूगल वालों ने क्या खिलाया यह तो वे स्वयं ही बताएंगे। खैर फोन पर तय हुआ कि हम लोग साथ साथ सैन होज़े से करीब 160 किलोमीटर दूर <a href="http://www.nps.gov/pore/">पोआंइट रियज़</a> नामक जगह पर जाएंगे। यह एक राष्ट्रीय पार्क है व वहां एक बहुत ही सुंदर लाइटहाउस भी है। <span id="more-181"></span> </p>
<p>इतवार की सुबह वसुधा व मैं आलोक सपरिवार जिस होटल में वह ठहरे थे वहाँ पहुंच गए।&nbsp; <a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ggday4.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="240" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ggday_thumb2.jpg" width="159" align="right" border="0"/></a>वसुधा व भाभी जी पीछे के सीट पर बैठीं व अपनी – शॉपिंग-पति-रसोई-मेकअप की बातों में ऐसी खोई की लगा वे बरसो से एक दूसरे को जानती हैं। बीच में हिन्दी चिट्ठाकारों की पत्नी होने का गम भी निकलकर आया। आलोक व मैं हाईवे 101 पर बतियाते हुए ड्राइव कर रहे थे। रास्ते में गोलडन गेट ब्रिज जो कि सैन फ्रांसिस्को की शान है भी आया व उसका रंग सुनहरा न हो कर बहुत कुछ जंग जैसे रंग का है तो इस बात पर बहस हो गई कि इसका नाम रस्टी ब्रिज होना चाहिए। मैंने कहा कि फिर कौन इसे देखने आएगा। खैर इस बातचीत में हाइवे वन को मिस कर गए व उससे करीब 15-16 किलोमीटर आगे निकल गए। खैर अपने को कौन सा वहाँ जल्दी थी पहुंचने की। गाड़ी वापिस घुमाई व सौतन के बेटे में चल रहे इंटरनेट से दूबारा से रास्ता मैप किया। मजे की बात है जहां से गाड़ी वापिस की वह एक फयूनरल होम, यानि मुर्दाघर था। हमने चिकाई कि भैया देखो जहां से लोग वापिस नहीं आते वहां से वापिस ले कर जा रहाँ हूँ। </p>
<p>ग्यारह बजे तक हम अपनी मंजिल पर पहुंच गए। लाइट हाउस पहुंचने के लिए 300 से ज्यादा सीढ़ियाँ उतरनी थी यानि की करीब करीब 30 मंजिला इमारत पर चढ़ना व उतरना। जै माता दी कह कर उतरे व वाकई बहुत खूबसूरत जगह थी। उतरते वक्त बादलों से होकर गुजरे। ऊपर जहाँ से उतराई शुरु की थी वहाँ इतनी हवा चलती थी कि लगभग सभी पेड़ एक तरफ झुक चुके थे। रास्ते में पहली बार लाल रंग की काई भी देखी। वहाँ लोगों से पता चला कि किस्मत अच्छी हो तो लाइटहाउस से कई बार व्हेल मछलियाँ भी नजर आती हैं। </p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/lalkaai2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="270" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/lalkaai_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a>  </p>
<p>इसके बात वापिसी की यात्रा शुरु हुई। रास्ते में हिन्दी व जालजगत पर बातें हुई। पहले गूगल के बारे में। आलोक ने बताया कि वहां से पता चला कि लोग अंग्रेजी शब्दों (मेरे ख्याल से यहाँ उन्नत देशों से आने वाली खोजों की बात होनी चाहिए) में करोड़ों खोजे करते हैं पर बाकी सभी अन्य भाषायों कि मिला कर भी 50000 से ज्यादा खोजे नहीं होती। अगर इस तरह से सोचें तो जितना गूगल ने हिन्दी के लिए किया उतना और किसी भी कम्पनी ने नहीं किया। फिर बात हुई हिन्दी में आ रहे नए एग्र<br />
ीगेटर व नए सजालों के बारे में। जिस पर हम दोनों का ही मानना है कि <strong>अभी हमारी कम्यूनटी इतनी छोटी है कि जितनी नई चीजे आए उतना अच्छा। हमें इसे </strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Zero-sum"><strong>जीरो सम</strong></a><strong> गेम नहीं समझना चाहिए। कि अगर किसी एक का फायदा हो रहा है तो पक्का दूसरे का नुकसान होगा। हम दोनों ने माना कि जितने नए टूल / सजाल आएंगे पाई बंटेगी नहीं ज्यादा बड़ी होगी।</strong> फिर आलोक ने अपने <a href="http://dmoz.org/World/Hindi/">डीमोज</a> का संपादक होने से संबधित अनुभवों के बारे में बताया।  </p>
<p>यही बातें करते रास्ता बढ़िया कट रहा था कि मेरी श्रीमती जी को मोशन सिकनेस हो ग<a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ambercafe3.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="84" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ambercafe_thumb1.jpg" width="164" align="right" border="0"/></a>ई व&nbsp; उन्होंने कहा कि वे आगे वाली सीट पर आ कर बैठेंगी। इस तरह से हमारी तकनीकी बातों को ब्रेक मिली व आलोक जी पिछली सीट पर चले गए। अगले दस मिनट में कार में मेरे अलावा सभी लोग सो गए व मैंने नींद भगाने के लिए गाने गाने शुरु कर दिए। अच्छी बात है कि लोग गहरी नींद में थे नहीं तो वहीं गाड़ी रुकवा कर उतर जाते कि भाई इतना बेसुरा सुनने से अच्छा है कि पैदल चला जाए। करीब तीन बजे हम लोग वापिस सिलिकन वैली पहुंचे व सीधा <a href="http://www.amber-india.com/cafe/cafe.swf">अम्बर कैफे</a> में जाकर आलू-पूड़ी, छोले भटूरे, बैंगन-टमाटर का पिज्जा व सीख कबाब ऑडर किए व एक बढ़िया सफर का अंत हुआ।  </p>
<p>जाते जाते पोआंइट रियज़ के लाइटहाउस की फोटू। यह धूंधली नहीं है बल्कि बादलों से घिरी है। </p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ptreyeslighthouse2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="182" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ptreyeslighthouse_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a></p>
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		<title>हवा से चलती गाड़ी</title>
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		<pubDate>Sun, 27 May 2007 02:42:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
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		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>

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		<description><![CDATA[कॉलेज के जमाने में होस्टल की मैस में शनिवार को नाश्ते में मूली के पराँठे मिलते थे। उस समय दोस्तों से मजाक में कई बार इस बात पर मनन होता था कि यदि हम बहुत सारे पराँठे खा लें और इसके बाद जो होता है थोड़े थोड़े अंतराल पर होने की बजाए अगर एक सार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/b83b2aa586e1_11549/image02.png" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; margin: 0px 0px 10px 15px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="192" src="http://pnarula.com/images/ms/b83b2aa586e1_11549/image0_thumb.png" width="240" align="right" border="0"/></a> कॉलेज के जमाने में होस्टल की मैस में शनिवार को नाश्ते में मूली के पराँठे मिलते थे। उस समय दोस्तों से मजाक में कई बार इस बात पर मनन होता था कि यदि हम बहुत सारे पराँठे खा लें और इसके बाद जो होता है थोड़े थोड़े अंतराल पर होने की बजाए अगर एक सार एक के बाद एक हो तो क्या आदमी भागता नजर आएगा। </p>
<p>वह मजाक की बात थी लेकिन फ्राँस की एक कम्पनी ऐसा कर भी दिया है, न न आदमी पर नहीं बल्कि कार पर। कार के पेट में कम्प्रेस्ड हवा भरी होगी व गाड़ी इस हवा के फैलने से चलेगी। क्या मजेदार बात है। न कोई धूंआ न प्रदूषण। अधिक जानकारी आप एम डी आई कम्पनी के <a href="http://www.theaircar.com/thecar.html">सजाल</a> से पा सकते हैं। मजे की बात है कि टाटा वालों का इनके साथ <a href="http://www.theaircar.com/tata_agreement.html">अनुबन्ध</a> भी है। अभी आप कह सकते हैं कि मेरी कार हवा से चलते हुए हवा से बातें करती है। </p>
<p>छवि साभार &#8211; <a title="http://www.theaircar.com/models.html" href="http://www.theaircar.com/models.html">http://www.theaircar.com/models.html</a></p>
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		<title>देर से पहुंचती मनु संतानें</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 21:13:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
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		<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>
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		<description><![CDATA[कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने के अलावा एक और बात जो लगभग सभी जगह देसीभाईयों में एकरस देखने को मिलती है कि अपन लोग समय की कदर बहुत कम करते हैं। मीटिंग मे बहुधा लेट पहुंचते हैं और यदि मीटिंग सुबह के 8 बजे हुई तो समझ लो बज गई घंटी।</p>
<p>यह बात सिर्फ मीटिंग तक ही सीमित नहीं है। अपने सभी कार्यकर्म शादी-ब्याह पर पहुँचना, बच्चों की शिक्षक-अभिभावक मीटिंग, पिकनिक के लिए सुबह निकलना सब के सब एक आई एस टी यानि इंडियन स्टैंड्रड टाईम रोग से पीड़ित हैं। हालत यह है कि इसे अपने आचार विहार का अंग मान लिया गया है कि भैया हम तो ऐसे ही हैं। इंडियन स्टैंड्रड टाइम के हिसाब से 30 से 60 मिनट लेट ही पहुंचेगे। यह मैं अपने अमरीका में रहे पिछले 8-9 सालों के अपने व यहाँ देसी बिरादरी को देखते हुए लिख रहा हूँ। शायद देश में भी ऐसा ही हो। इस बारे में टिप्पणी में बताएं।</p>
<p>हम ऐसे कैसे हो यह मैं नहीं जानता पर शायद यह बिमारी नई ही है। अपने बड़े बूढ़ों को देखता हूँ तो सभी सुबह जल्दी उठने वाले व जल्दी सोने वालों में से हैं। अपनी नसल उल्टी है देर से सोती है व देर से उठती है। अब कौन सही है कौन गलत यह तो दर्शन का विषय है पर यह बात पक्की है कि समय की कद्र करनी चाहिए खासकर ऐसी जगहों पर जहाँ आप बहुत से देशों के लोगों के साथ काम कर रहे हों क्यूंकि आपसे आप के देश की पहचान होती है और आप यह तो न चाहेंगे कि मनुपुत्र जिनके बारे में दिनकर जी ने निम्न कविता लिखी थी दुनिया में आलसी लेटलतीफ के नाम से प्रसिद्ध हो</p>
<blockquote><p><strong>मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br />बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</strong></p>
</blockquote>
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		<title>काला बुखारा मोती</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Mar 2007 22:02:54 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[पिछले महीने एक खिलौना खरीदा इतना पसंद है कि श्रीमती जी का कहना है कि पहले लैपटॉप सौतन थी अब यह सौतन का बच्चा आ गया है। तो बताईए क्या। यदि आपने बता दिया कि मैं किसके बारे में बात कर रहा हूँ तो इसके बारे में आगे लिखेंगे।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले महीने एक खिलौना खरीदा इतना पसंद है कि श्रीमती जी का कहना है कि पहले लैपटॉप सौतन थी अब यह सौतन का बच्चा आ गया है। तो बताईए क्या। यदि आपने बता दिया कि मैं किसके बारे में बात कर रहा हूँ तो इसके बारे में आगे लिखेंगे।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>मिलवॉकी में लग गई टाकी</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Dec 2005 04:44:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>

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		<description><![CDATA[कहते हैं मिर्ची की तासीर गर्म होती है। मुझे भी गर्म जगह ही पसंद आती हैं। ठंडे मौसम के चलते लुईविल छोड़ कर कैलिफोर्निया गया था। जिंदगी का जागते हुए सबसे कम तापमान 14 डिग्री फारेनहाईट देखा था। पर वह रिकार्ड भी टूट गया। आजकल काम के सिलसिले में मिलवॉकी में हूँ। ठंड़ी इतनी है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img width="150" height="50" align="right" src="http://pnarula.com/images/bt/cold-mke.jpg" />कहते हैं मिर्ची की तासीर गर्म होती है। मुझे भी गर्म जगह ही पसंद आती हैं। ठंडे मौसम के चलते लुईविल छोड़ कर कैलिफोर्निया गया था। जिंदगी का जागते हुए सबसे कम तापमान 14 डिग्री फारेनहाईट देखा था। पर वह रिकार्ड भी टूट गया। आजकल काम के सिलसिले में मिलवॉकी में हूँ। ठंड़ी इतनी है कि थूक फैंको तो बर्फ बनकर नीचे गिरती है। आज कार में कम्पास पर 9 डिग्री फाहरेहाइट यानि -13 डिग्री सेल्सियस देखा। फोटू देखिए। वैसे मैं अब गालिया नहीं देता। पर कॉलेज के जमानें में बिना इसके बात न होती थी। पर आज जैसे ही काम के बात स्टीयरिंग पर हाथ रखे। स्वतः मुहँ से फूल झड़ने लगे। s#!t  f@#k  का ऐसा तांता लगा कि जब नोटिस किया तो हंसी आई कि मिर्ची की एक्सट्रीम वेदर में हालत क्या हो गई है।</p>
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		<title>योसेमिती</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Jun 2005 02:12:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[यायावारी]]></category>

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		<description><![CDATA[कभी आप ने स्वर्ग की कल्पना की है सच क्या है यह तो पता नहीं कोई जानता है कि नहीं पर यदि कल्पना की दुनिया कि कहानियों व फिल्मों को देखें तो आप पाएंगे कि इस कल्पना में खूबसूरत वादियाँ, हर ओर हरियाली, सुंदर से पहाड़, उन की चोटियों पर दूर से दिखती बर्फ व [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कभी आप ने स्वर्ग की कल्पना की है सच क्या है यह तो पता नहीं कोई जानता है कि नहीं पर यदि कल्पना की दुनिया कि कहानियों व फिल्मों को देखें तो आप पाएंगे कि इस कल्पना में खूबसूरत वादियाँ, हर ओर हरियाली, सुंदर से पहाड़, उन की चोटियों पर दूर से दिखती बर्फ व कल कल बहते झरने जरुर होंगे। कुछ यही छटा होती है मई-जून में योसेमिती वादी की। योसेमिती वादी कैलिफोर्निया के मध्य पूर्व में करीब १,१७० वर्गमीलों में फैली है। अजीब बात है कि करोड़ों साल पहले यह वादी समुंद्र के नीचे थी जो फिर मैगमा में परिवर्तित हो कर सतह पर आकर जमीन के अंदर एक बहुत बड़े ग्रेनाईट के टुकड़े में बदल गई। फिर लाखों साल पहले यहाँ छोटी छोटी नरम मिट्टी की पहाड़ियाँ होती थी व मरसेड नदी भी बहती थी। इस मरसेड नदी ने भी उस समय वादी को कई तरह से तराशा। उसके बाद हिमयुग आगया व ग्लेशियर इस जगह पर जम गए जिन्होने बाद में पिंघल कर बहते हुए आज की योसिमिती वादी को जन्म दिया।</p>
<p>आज यह योसेमिती कैलिफोर्निया आने वालों के लिए एक प्रमुख आकर्षण है। यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं फिर तो यहाँ आए बिना रहा ही नहीं जा सकता और यदि केवल प्रेमी भी हैं तो प्रेयसी से झरनों के किनारे प्रीत भरी बातें करने से प्यारी जगह क्या होगी। आईए पढ़े यहाँ पर लोग सबसे ज्यादा किसे देखने आते हैं व क्या प्रसिद्ध है।<br />
<img class="alignleft" src="http://www.pnarula.com/images/haanbhai/halfdome-vernal-nevada.jpg" alt="हॉफ डोम, नेवाडा फॉल्स, वरनाल फॉल्स" /><br />
हॉफ डोम यानि अर्ध गुंबद ग्रेनाईट की बहुत बड़ी व ऊंची चट्टान है। इसकी उत्पत्ति की कहानी योसेमिती को बनाने वाले ग्लेशियर से ही जुड़ी है। जब यह ग्लेशियर बाबू रैम्बो की तरह चल रहे थे तो जो भी रास्ते में  आया उसे काटते चले गए। इसी कटाई से बना यह हॉफ डोम। दायीं दी गई छवि में देखिए कैसी काटा है ग्लेशियर ने जैसे विश्वकर्मा जी के प्रमुख शिल्पी ही काटने आए हों। हॉफ डोम एक और वजह से भी प्रसिद्ध है। सारी दुनिया के पर्वतारोहियों की सूची में हॉफ डोम भी प्रमुख स्थान रखता है। यदि आप ने इस की चढ़ाई करली तो समझिए सही में काफी ऊचाईयों पर पहुँच गए।</p>
<p>अल कपतान &#8211; कहते हैं अंग्रेजों ने ताजमहल मथुरा के एक बनिये को बेच दिया था बनिया इतनी मात्रा में संगमरमर काटने की सोच न सका व ताजमहल अपनी जगह ही है। कुछ वैसी ही मात्रा में ग्रेनाईट का पत्थर है अल कपतान में। यह दुनिया कि सबसे बड़ी अविभाजित ग्रेनाइट चट्टान है। <img class="alignright" src="http://www.pnarula.com/images/haanbhai/el-capitan.jpg" alt="अल-कपतान" />इसे पहली बार देखने वाले इससे इतने प्रभावित हुए कि इसे कपतान का दर्जा दिया। योसेमिती वादी घूमते हुए जब भी अल कपतान पर नजर जाती है तो भगवान में विश्वास बढ़ जाता है। सोचिए इतना सारा ग्रेनाईट शायद अगर इसकी स्लैब्स काटी जाएं तो पूरे अम्बाला में ग्रेनाइट की सड़के बनवा दें।</p>
<p>कल कल बहते झरने सभी को योसेमिती की ओर खींचते हैं। झरनों की आवाज में कुछ जादूई आकर्षण है आप सम्मोहित से इनके किनारे घंटो बिता सकते है। योसेमिती में झरने हैं भी बहुत से। वैसे भी चोटियों पर बर्फ पिंघली पानी ने नया रुख इख्तयार किया तो नया झरना बन गया। पर कुछ बड़े बड़े झरने अति प्रसिद्ध हैं। सबसे ऊँचा झरना है योसेमिटी जो कि दो भागों में बंटा है। यह अमेरिका का सबसे ऊँचा झरना भी है। पहुँचने में सबसे आसान झरना है ब्राइडलवेल यानि दुल्हन का घूँघट। फिर दो जुड़वां भाईयों की तरह झरने हैं वरनाल व नेवाडा फॉल्स।<br />
<img class="alignleft" src="http://www.pnarula.com/images/haanbhai/bridal-veil.jpg" alt="ब्राइडलवेल फॉल्स" /><br />
योसिमिती में जाकर रात में रहने के कई साधन हैं पर सबसे मजेदार है तम्बू लगा कर रहना। छोटी गैस पर जंगल में खाना बनाना, लकड़ियाँ इक्कठी कर आग का अलाव लगा कर घंटो बाते करने शहर की जिंदगी से एक अच्छी छुट्टी है। यदि आप दुनिया के इस कोने में आए तो प्रकृति के इस उपहार का आंनद लेना न भूलें। अधिक जानकारी योसिमिती के सजाल से ली जा सकती है।</p>
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