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	<title>मिर्ची सेठ &#187; फिल्म समीक्षा</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
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		<title>गुरु &#8211; बिजनेस करेंगे</title>
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		<pubDate>Sat, 13 Jan 2007 19:10:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[फिल्म समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे दोस्त गुरु का तीन बजे फोन आया कि गुरु देखने चलना है क्या? हम लोग काफी दिन से इसके विज्ञापन देख रहे थे व देखने का मन बना चुके थे कि भाई इसके लिए दस डॉलर खरचने ही हैं। बिना समीक्षाएं पढ़े देखने गए गुरु को। यहाँ बे-एरिया के ट्रैफिक के वजह से १५ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे दोस्त गुरु का तीन बजे फोन आया कि गुरु देखने चलना है क्या? हम लोग काफी दिन से इसके विज्ञापन देख रहे थे व देखने का मन बना चुके थे कि भाई इसके लिए दस डॉलर खरचने ही हैं। बिना समीक्षाएं पढ़े देखने गए गुरु को। यहाँ बे-एरिया के ट्रैफिक के वजह से १५ मिनट लेट पहुँचे।</p>
<p>पर गुरु से जितनी उम्मीदें थी उससे भी अच्छी निकली। गुरुकांत देसाई व सुजाता वाकई कमाल के किरदार बनाएं हैं। गुरु जिसने न सुनना नहीं सीखा। धंधे की इतनी समझ की सारी दुनिया से अलग जा सकने की कुवत। दुनिया सूत खरीद रही है तो हम केला सिल्क बनाएंगे। बनिया बुद्धि ऐसी कि आवाज भी बचा कर खर्चते हैं। रास्ते में सरकार के दकियानूसी कानून व लाईसेंस भी आएं तो सरकार से भी पंगा ले सकने का साहस। वहीं सुजाता हर कदम पर पति के साथ। सुःख दुःख हर कदम पर साथ साथ। समझ इतनी कि अगर मायके वाले गलत जाएं तो उन्हें गलत कहना।&nbsp;</p>
<p>एक अच्छी फिल्म बड़े पर्दे पर ही देखें।&nbsp;</p>
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		<title>मंगल पांडे</title>
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		<pubDate>Sun, 14 Aug 2005 18:21:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[फिल्म समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[सभी की तरह वसुधा व मैं फिल्मों के बहुत शौकीन हैं। ऐसा कम ही होता है कि हम लोग किसी फिल्म की समीक्षा के बिना देखने पहुंच जाते हैं। शाम को छःह बजे प्रोग्राम बना कि मंगल पांडे देखने चलते हैं। नाज पर देखा तो पता चला कि 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" src="http://pnarula.com/images/haanbhai/mangal1.jpg" alt="मंगल पांडे" />सभी की तरह वसुधा व मैं फिल्मों के बहुत शौकीन हैं। ऐसा कम ही होता है कि हम लोग किसी फिल्म की समीक्षा के बिना देखने पहुंच जाते हैं। शाम को छःह बजे प्रोग्राम बना कि मंगल पांडे देखने चलते हैं।<a href="http://naz8.com"> नाज</a> पर देखा तो पता चला कि 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 हर घंटे पर एक शो चल रहा है। सात बजे के शो की ठान के निकल पड़े। सात वाला पूरा बिक चुका था इसलिए आठ बजे वाले की टिकटें ही मिल पाई। इतनी भीड़ देख कर मन प्रसन्न हुआ। लगता है बॉलीवुड के दिन फिर चुके हैं। ऐसा तो पहले नब्बे के दशकांत की डॉट कॉम क्रांति के समय पर होता था।</p>
<p>फिल्म का प्रारंभ होता है अतयंत ही सुन्दर गीत &#8220;मंगल मंगल, मंगल मंगल, मंगल मंगल हो&#8221;। हरदिन की शुरुआत ऐसी ही होनी चाहिए। मंगल पांडे की कहानियों में सुनी कथा के अलावा इस फिल्म में और भी बहुत कुछ है। ईस्ट इंडिया कम्पनी के बारे में पूछते हुए मंगल अपने दोस्त व आला ऑफिसर विलियम गॉरडन से पूछता है कि</p>
<blockquote><p><strong>मंगल</strong>:साहिब यह कंपनी क्या है ?</p>
<p><strong>विलियम</strong>: तुम्हारी रामायण में रावण नाम का विलेन है जिस के दस सिर हैं। कम्पनी भी ऐसा ही लाखों सिरो वाला विलेन है जिस  के सिर लालच की ग्लू से जुड़े है। </p></blockquote>
<p><img class="alignright" src="http://pnarula.com/images/haanbhai/mangal2.jpg" alt="मंगल हो" /><br />
कितनी कालजयी बात है। फिल्म के बारें कही गई बाकी की बातें आप तरुण जी निठल्ला चिंतन वाले की  <a href="http://apniduniya.blogspot.com/2005/08/ballad-of-mangal-pandey.html">इस प्रविष्टि</a> व दीवान साहिब की <a href="http://deewananeeraj.blogspot.com/2005/08/blog-post_13.html">इस प्रविष्टि</a> में पढ़ सकते हैं। मैं तरुण की कही गई लगभग हर बात से वाकिफ हूँ सिवाए संगीत के। मंगल हो गाने को छोड़ कर बाकी गाने सामान्य हैं। वैसे इस का एक कारण यह भी है कि लगान और दिल चाहता है जैसी फिल्मों के अति उत्तम संगीत के बाद हर फिल्म में वैसा ही सुनना चाहते हैं।</p>
<p><strong>मंगल हो ।।</strong></p>
<p>छवियां साभार: http://mangal-pandey.com</p>
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		<title>स्वदेस</title>
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		<pubDate>Wed, 29 Dec 2004 05:00:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[फिल्म समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[हर बार कि तरह इस बार भी सारी दुनिया के लिखने के बाद अपनी ढपली बजा रहा हूँ। फिल्म तो दो हफ्ते पहले देख ली थी, समीक्षा लिखने अब बैठ रहा हूँ। स्वदेस से बहुत लोगों को बहुत तरह की उम्मीदें थी। सबसे ज्यादा कि देखें लगान का निर्देशक क्या नया करके दिखाता है। नया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हर बार कि तरह इस बार भी सारी दुनिया के लिखने के बाद अपनी ढपली बजा रहा हूँ। फिल्म तो दो हफ्ते पहले देख ली थी, समीक्षा लिखने अब बैठ रहा हूँ। स्वदेस से बहुत लोगों को बहुत तरह की उम्मीदें थी। सबसे ज्यादा कि देखें लगान का निर्देशक क्या नया करके दिखाता है। नया तो भैया उसने कर के दिखाया। पर शायद बॉक्स ऑफिस को पंसद न आए। पर मुझे बहुत पंसद आया। गर आप फिल्म मजे के लिए देखने जा रहे हो तो भाई न ही जाओ। पर यदि आप एक आप्रवासी भारतीय की अपनी जड़ों से जुड़ने की जद्दोजहद की कहानी, कुछ बेहतर अदाकारी और जिंदगी देखना चाहते हैं तो जरुर देखिए।</p>
<p><img src="http://pnarula.com/images/haanbhai/swades.jpg" alt="स्वदेश" /></p>
<p>मेरे अपने पंसदीदा सीन हैं मोहन भार्गव यानि शाहरुख खान के मैनेजर का मोहन का त्यागपत्र यह कह कर स्वीकारना</p>
<blockquote><p>Mohan! Go light your bulb..</p></blockquote>
<p>दूसरे पंसदीदा सीन में मोहन गाड़ी में बैठा है और गाड़ी स्टेशन पर रुकती है। एक 8-9 साल का बच्चा 25 पैसे पानी का गिलास कहता हुआ इधर से उधर घूम रहा है।</p>
<p>स्विस्तार समीक्षा आप इस <a href="http://rebel_in_me.rediffblogs.com">कड़ी </a>पर पढ़ सकते हैं।</p>
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		<title>नाच नाच के दुनिया हिला दे</title>
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		<pubDate>Fri, 10 Dec 2004 04:55:47 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[फिल्म समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[कोहेनूर1 पर जब नाच की डीवीडी देखी तो पहली बार तो एक और बॉलीवुड फिल्म जानकर नजरअंदाज कर दिया। पर अगले सप्ताहंत पर जब देखा कि कोई भी नई फिल्म नहीं आई तो आया हूँ तो कुछ लेकर जाउंगा वाले अंदाज में नाच देखने के लिए उठा ली। अगर नाहक नंगेपन को नजरअंदाज कर दिया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कोहेनूर<sup>1</sup> पर जब नाच की डीवीडी देखी तो पहली बार तो एक और बॉलीवुड फिल्म जानकर नजरअंदाज कर दिया। पर अगले सप्ताहंत पर जब देखा कि कोई भी नई फिल्म नहीं आई तो <strong>आया हूँ तो कुछ लेकर जाउंगा </strong>वाले अंदाज में नाच देखने के लिए उठा ली।</p>
<p>अगर नाहक नंगेपन को नजरअंदाज कर दिया जाए तो मुझे नाच काफी पंसद आई। देखकर लगा कोई तो है जो फिल्म को उसके मौलिक कारण की ओर लेकर जा रहा है – यानि कि कथा-कहानी सुनाना। राम गोपाल वर्मा की नाच फिल्मों में व्यावहारिकता एवं कला की कलाकार के अनुसार अभिव्यक्ति के संघर्ष की कहानी है। <span id="more-65"></span><br />
अंतरा माली जो कि <em>कला को कला के मायने</em> से अभिव्यक्त करना चाहिए को मानने वाली संघर्षरत नृत्य निर्देशिका है। वह कुछ बन के दिखाने के लिए किसा का सहारा नहीं लेना चाहती और न ही अपने मुल्यों से बिदकना चाहती है । जबकि अभिषेक बच्चन बड़ा कलाकार बनने के लिए जो भी करना पड़ा करुँगा सरीखा नव अभिनेता है। बस इन्हीं दोनों के आस पास कही गई कहानी है नाच।</p>
<p>फिल्म में अंतरा माली का व्यक्तितव व सोचने का नज़रिया बहुत कुछ अयन रैंड के फांउटेनहैड के नायक की तरह है। नायक का जो कि आर्किटेक्ट है का मानना है कि हर इमारत का अपना एक मकसद होता है वैसे ही हर नाच एक खास वजह से होता है। नायक को पुराने घिसे पिटे तरीके जैसे ग्रीको रोमन मेहराब, खिड़कियाँ जो कि पुराने समय में ठीक रही होंगी बेतरतीब लगती हैं वैसे ही अंतरा माली को हिंदी गानों के नाच का एक ही फारमूला बुरा लगता है। फिल्म में एक जगह अंतरा अपने अंतर्मन की आग नाच के जरिए निकाल रही होती है और दूसरे सीन में अभिषेक एक बॉलीवुड का पेड़ों के चारों ओर घूमने वाला गाना गा रहा होता है। एक और जगह पर फिल्म के अंदर एक निर्देशक एक गाने की शुटिंग को देख कर कहता है कि सब सरकस लगता है। पर साथ ही बैठा सहायक कहता है कि दर्शकों को यही पंसद आता है। ऐसे ही और भी बहुत से दृश्य हैं जहां मौलिकता व व्यावहारिकता में संघर्ष दिखाया गया है।</p>
<p>ऐसा नहीं है कि फिल्म सारी की सारी अच्छी है। अंतरा माली को वर्मा जी ने नख से शिख तक परखा है। जबकि इसके बिना काम चल सकता था। अंतरा का नाच चीनी मार्शल आर्टस ज्यादा लगता है। पर फिर भी एक कहानी को कहने के लिए वर्मा जी के विभिन्न प्रयास जिसमें नाच भी शामिल है की सराहना करनी चाहिए।</p>
<p>[1] कोहेनूर मेरे यहाँ की डीवीडी किराए पर देने की दूकान है</p>
]]></content:encoded>
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		<title>वीर ज़ारा और सॉफ्टवेयर इंजीनियर</title>
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		<pubDate>Fri, 19 Nov 2004 08:58:48 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[फिल्म समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[अभी अभी वीर-ज़ारा देख कर आ रहा हूँ। अब चोपड़ा जी की फैक्टरी से निकली है तो अच्छी तो होगी ही और जाहिर है कि प्रेम-कथा भी है (जैसे की देस में और दूसरी फिल्में भी बनती ही हैं) यदि आपको दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे पंसद आई थी तो यह भी पंसद आयगी। अभी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अभी अभी वीर-ज़ारा देख कर आ रहा हूँ। अब चोपड़ा जी की <a href="http://www1.yashrajfilms.com/">फैक्टरी </a>से निकली है तो अच्छी तो होगी ही और जाहिर है कि प्रेम-कथा भी है (जैसे की देस में और दूसरी फिल्में भी बनती ही हैं) यदि आपको दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे पंसद आई थी तो यह भी पंसद आयगी।</p>
<p>अभी आप सोच रहे होंगे कि बाकि तो ठीक है पर प्रविष्टि के शीर्षक का क्या मतलब है। वो ऐसे कि शाहरुख खान एक जगह पर अपना परिचय देते हुए जैसा कि सेना में प्रचलित है अपना पद भी अपने नाम के साथ लगा कर बताते हैं &#8211; स्कावार्डन लीडर वीर प्रताप सिंह। तो मुझे एक बात सूझी कि अपुन लोग तो कभी भी अपना परिचय ऐसे नहीं देते। कितना मजा आए आप किसी से मिलें और अपना परिचय दें &#8211; मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर पंकज कुमार नरुला ।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>ऐतबार फिल्म समीक्षा</title>
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		<pubDate>Tue, 10 Feb 2004 01:43:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator></dc:creator>
				<category><![CDATA[फिल्म समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA[आज इतवार था और फिल्म देखना बनता था । लाला के पास ऐतबार पड़ी थी । Typical देसी movie थी । पहला half अपने को कोसते निकला । दूसरे हाफ में कुछ ठीक हुई । Movie ऐक पिता के अपनी जवान बेटी को एक Psychopath आशिक से बचाने के संघर्ष के बारे में है ।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आज इतवार था और फिल्म देखना बनता था । लाला के पास ऐतबार पड़ी थी । Typical देसी movie थी । पहला half अपने को कोसते निकला । दूसरे हाफ में कुछ ठीक हुई । Movie ऐक पिता के अपनी जवान बेटी को एक Psychopath आशिक से बचाने के संघर्ष के बारे में है ।</p>
]]></content:encoded>
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