<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>मिर्ची सेठ &#187; आप्रवासी</title>
	<atom:link href="http://ms.pankajnarula.webfactional.com/category/%e0%a4%86%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com</link>
	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
	<lastBuildDate>Sun, 21 Feb 2010 16:40:36 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.1</generator>
		<item>
		<title>यदि भारत अमरीका हो जाए तो &#8211; श्वते-श्याम एडिशन</title>
		<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200708/%e0%a4%af%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%8f-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b6/</link>
		<comments>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200708/%e0%a4%af%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%8f-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b6/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 04 Aug 2007 18:05:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>
		<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ms.pnarula.com/200708/%e0%a4%af%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%8f-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b6/</guid>
		<description><![CDATA[आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई &#8211; अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” प्रविष्टियां लिख डाली। बड़ी सी पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[</p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/7a8aa7ded6d3_9BFE/image03.png" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="79" src="http://pnarula.com/images/ms/7a8aa7ded6d3_9BFE/image0_thumb1.png" width="163" align="right" border="0"/></a> आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई &#8211; अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” <a href="http://www.akshargram.com/2007/07/31/636/">प्रविष्टियां</a> लिख डाली। बड़ी सी पर जोर इस लिए दे रहा हूँ कि आलोक अपनी कम लिखे को ज्यादा समझना – तार को खते समझना जैसी ब्लॉग पोस्टों के लिए <strike>बदनाम</strike> प्रसिद्ध हैं। खैर अगर ऐसी कोई बात है तो मैं आलोक से इस खाने वाली चीज के बारे में जरुर जानना चाहुंगा। श्रीमती जी कैमिस्ट्री की रिसर्च-स्नातक हैं उनसे कह कर इस चीज के अंदर के विटामिन निकलवाकर – बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे।  </p>
<p>वैसे लिखना तो आलोक को पहले चाहिए था कि अमरीका उन्हें कैसा लगा। वैसा ही जैसा वे सोचते था या अलग। पर उन्होंने अपनी सोच की छिपकली सभी पर छोड़ दी अभी भाई लोग अनुगूंज में सोच सोच कर लिख रहे हैं। अब बड़े भाई ने कहा है तो लिखना तो पड़ेगा ही। तो लीजिए हमारी भी श्वेत-श्याम आहुति इस <a href="http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/">22वीं अनुगूंज</a> में। <span id="more-186"></span></p>
<p><strong>श्वेत संस्करण</strong> </p>
<p>जे कर अपणा भारत अमरीका बण जावे ते भाई घणा मजा आवे। सिस्टम काम करने लगेगा। बाबू भाई दफ्तर वाले बिना रिश्वत लिए ठीक टाइम पर बिना भाव खाए काम करने लगेगें। लोग बाग अपने शहर को अपना शहर समझने लगेंगे। कूड़ा कूड़े दानों में ही फैंकेगे व बस, रेलगाड़ी, राशन की दुकानों में आराम से बिना भगदड़ मजाए लाइन से लगेंगे। शहरों में सुंदर सुंदर पार्क होंगे व किताबों से भरी सार्वजनिक लाइब्रेरियां होंगी। नलों में हर समय पानी आएगा व बिजली साल छमाही में एक बार बता कर जाएगी। सड़के, गली के बल्ब एक निश्चित समय पर मरम्मत कीए जाएंगे न कि जब तक चल रहे हैं चलने दो जब टूट जाएंगे तो ठीक करेंगे। अदालते समय रहते काम करेंगी व सरकार लोगों की जिंदगी में थोड़ा कम दखल देगी। लाइसेंस राज और ज्यादा काबू में किया जाएगा। सरकार के खर्चे पारदर्शी होंगे।  </p>
<p><strong>श्याम संस्करण</strong> </p>
<p>भाई जे कर भारत ना अमरीका बण गयो – घणो मुसीबत आ जावे। डाक्टर पर जाणे से पहले लोग सो बार सोचें। ये नहीं कि जब मन किया चले गए। डाक्टर के पास जाने के बाद इंश्योरस वालों से लड़ें कि ये खर्चा कवर नहीं किया मैं इसके पैसे क्यूं दूं जब इंश्योरंस का प्रीमियम देता हूँ। बाप बेटे के बड़े होने पर सोचे की यार ये बाहर क्यूं नहीं जाता और घर पर रह रहा है तो किराया देना शुरु करे। पार्टी में जाएं तो आप का दोस्त अपने परिवार से कुछ इस तरह मिलवाए – यह है मेरी तीसरी बीवी, ये बिल्लू पिंकी मेरे बच्चे है, घसीटा मेरी बीवी का सुपुत्र है व ये टिनटिन हमदोनों की बेटी है। आदमी उमर के तकाज़े भूलने लगे – सात साल का बच्चा साठ साल के आदमी को नाम से पुकारे, साठ साल की आंटी टम्मी टक व ब्रेस्ट आग्यूमेंट कराकर कल्बों में प्राउल पर निकले। पूरे देश में सामान खरीदने की गिन 30-40 तरह की दुकाने होंगी। जहाँ जाइए हर जगह आप को टारगेट, कोल्स, बेस्ट बॉय, सर्किट सिटी, वालमार्ट मिल जाएगा। कोई विविधता नहीँ। मदरास की साड़िया, मथुरा के पेड़े, पंजाब का साग व गुजरात का खाकरा क्या होता है भाई।  </p>
<p>आज के लिए इतना ही। </p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200708/%e0%a4%af%e0%a4%a6%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%8f-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%b6/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>6</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मिलना हिन्दी के पहले स्पाइडर मैन से</title>
		<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200707/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a1%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8/</link>
		<comments>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200707/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a1%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 03 Jul 2007 20:45:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ms.pnarula.com/200707/%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be/</guid>
		<description><![CDATA[कुछ दिन पहले सौतन के बेटे (मेरा मोबाइल जिस पर ईमेल आती है) ने आलोक का कम-लिखे-को-ज्यादा समझने वाला संदेश दिया कि “भई हम आपके देश में है, समय मिले तो फोन कीजिएगा”। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं कि चलिए आखिरकार आलोक से मिलना हो पाएगा। आलोक भाई ने अंतर्जाल पर हिन्दी का पहला जाल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[</p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/mirchialok2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="189" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/mirchialok_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a>  </p>
<p>कुछ दिन पहले <a href="http://ms.pnarula.com/200703/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%80/">सौतन के बेटे</a> (मेरा मोबाइल जिस पर ईमेल आती है) ने <a href="http://devanaagarii.net/hi/alok/blog/">आलोक</a> का कम-लिखे-को-ज्यादा समझने वाला संदेश दिया कि “भई हम आपके देश में है, समय मिले तो फोन कीजिएगा”। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं कि चलिए आखिरकार आलोक से मिलना हो पाएगा। आलोक भाई ने अंतर्जाल पर हिन्दी का पहला जाल बिछाया था तो इस नजर से वे हैं हिन्दी के पहले स्पाइडर मैन साथ ही वे मेरे कॉलेज के सुपर सीनियर (जिनसे आप कॉलेज में न मिले हों) भी हैं इसलिए बाते भी करने को काफी होंगी। </p>
<p>फोन लगाया तो पता लगा कि वे सिलिकन वैली पधार रहे हैं व गूगल वालों से भी मिलेंगे। भई वाह हम पड़ोस में रहते हैं पर आजतक उन लोगों से हिन्दी के बारे में बात करने नहीं गए। आलोक भाई उनसे मिले भी व उनसे हिन्दी के बारे में चर्चा भी की। इस बारे में आगे लिखूंगा। वहाँ गूगल वालों ने क्या खिलाया यह तो वे स्वयं ही बताएंगे। खैर फोन पर तय हुआ कि हम लोग साथ साथ सैन होज़े से करीब 160 किलोमीटर दूर <a href="http://www.nps.gov/pore/">पोआंइट रियज़</a> नामक जगह पर जाएंगे। यह एक राष्ट्रीय पार्क है व वहां एक बहुत ही सुंदर लाइटहाउस भी है। <span id="more-181"></span> </p>
<p>इतवार की सुबह वसुधा व मैं आलोक सपरिवार जिस होटल में वह ठहरे थे वहाँ पहुंच गए।&nbsp; <a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ggday4.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="240" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ggday_thumb2.jpg" width="159" align="right" border="0"/></a>वसुधा व भाभी जी पीछे के सीट पर बैठीं व अपनी – शॉपिंग-पति-रसोई-मेकअप की बातों में ऐसी खोई की लगा वे बरसो से एक दूसरे को जानती हैं। बीच में हिन्दी चिट्ठाकारों की पत्नी होने का गम भी निकलकर आया। आलोक व मैं हाईवे 101 पर बतियाते हुए ड्राइव कर रहे थे। रास्ते में गोलडन गेट ब्रिज जो कि सैन फ्रांसिस्को की शान है भी आया व उसका रंग सुनहरा न हो कर बहुत कुछ जंग जैसे रंग का है तो इस बात पर बहस हो गई कि इसका नाम रस्टी ब्रिज होना चाहिए। मैंने कहा कि फिर कौन इसे देखने आएगा। खैर इस बातचीत में हाइवे वन को मिस कर गए व उससे करीब 15-16 किलोमीटर आगे निकल गए। खैर अपने को कौन सा वहाँ जल्दी थी पहुंचने की। गाड़ी वापिस घुमाई व सौतन के बेटे में चल रहे इंटरनेट से दूबारा से रास्ता मैप किया। मजे की बात है जहां से गाड़ी वापिस की वह एक फयूनरल होम, यानि मुर्दाघर था। हमने चिकाई कि भैया देखो जहां से लोग वापिस नहीं आते वहां से वापिस ले कर जा रहाँ हूँ। </p>
<p>ग्यारह बजे तक हम अपनी मंजिल पर पहुंच गए। लाइट हाउस पहुंचने के लिए 300 से ज्यादा सीढ़ियाँ उतरनी थी यानि की करीब करीब 30 मंजिला इमारत पर चढ़ना व उतरना। जै माता दी कह कर उतरे व वाकई बहुत खूबसूरत जगह थी। उतरते वक्त बादलों से होकर गुजरे। ऊपर जहाँ से उतराई शुरु की थी वहाँ इतनी हवा चलती थी कि लगभग सभी पेड़ एक तरफ झुक चुके थे। रास्ते में पहली बार लाल रंग की काई भी देखी। वहाँ लोगों से पता चला कि किस्मत अच्छी हो तो लाइटहाउस से कई बार व्हेल मछलियाँ भी नजर आती हैं। </p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/lalkaai2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="270" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/lalkaai_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a>  </p>
<p>इसके बात वापिसी की यात्रा शुरु हुई। रास्ते में हिन्दी व जालजगत पर बातें हुई। पहले गूगल के बारे में। आलोक ने बताया कि वहां से पता चला कि लोग अंग्रेजी शब्दों (मेरे ख्याल से यहाँ उन्नत देशों से आने वाली खोजों की बात होनी चाहिए) में करोड़ों खोजे करते हैं पर बाकी सभी अन्य भाषायों कि मिला कर भी 50000 से ज्यादा खोजे नहीं होती। अगर इस तरह से सोचें तो जितना गूगल ने हिन्दी के लिए किया उतना और किसी भी कम्पनी ने नहीं किया। फिर बात हुई हिन्दी में आ रहे नए एग्र<br />
ीगेटर व नए सजालों के बारे में। जिस पर हम दोनों का ही मानना है कि <strong>अभी हमारी कम्यूनटी इतनी छोटी है कि जितनी नई चीजे आए उतना अच्छा। हमें इसे </strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Zero-sum"><strong>जीरो सम</strong></a><strong> गेम नहीं समझना चाहिए। कि अगर किसी एक का फायदा हो रहा है तो पक्का दूसरे का नुकसान होगा। हम दोनों ने माना कि जितने नए टूल / सजाल आएंगे पाई बंटेगी नहीं ज्यादा बड़ी होगी।</strong> फिर आलोक ने अपने <a href="http://dmoz.org/World/Hindi/">डीमोज</a> का संपादक होने से संबधित अनुभवों के बारे में बताया।  </p>
<p>यही बातें करते रास्ता बढ़िया कट रहा था कि मेरी श्रीमती जी को मोशन सिकनेस हो ग<a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ambercafe3.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="84" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ambercafe_thumb1.jpg" width="164" align="right" border="0"/></a>ई व&nbsp; उन्होंने कहा कि वे आगे वाली सीट पर आ कर बैठेंगी। इस तरह से हमारी तकनीकी बातों को ब्रेक मिली व आलोक जी पिछली सीट पर चले गए। अगले दस मिनट में कार में मेरे अलावा सभी लोग सो गए व मैंने नींद भगाने के लिए गाने गाने शुरु कर दिए। अच्छी बात है कि लोग गहरी नींद में थे नहीं तो वहीं गाड़ी रुकवा कर उतर जाते कि भाई इतना बेसुरा सुनने से अच्छा है कि पैदल चला जाए। करीब तीन बजे हम लोग वापिस सिलिकन वैली पहुंचे व सीधा <a href="http://www.amber-india.com/cafe/cafe.swf">अम्बर कैफे</a> में जाकर आलू-पूड़ी, छोले भटूरे, बैंगन-टमाटर का पिज्जा व सीख कबाब ऑडर किए व एक बढ़िया सफर का अंत हुआ।  </p>
<p>जाते जाते पोआंइट रियज़ के लाइटहाउस की फोटू। यह धूंधली नहीं है बल्कि बादलों से घिरी है। </p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ptreyeslighthouse2.jpg" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="182" src="http://pnarula.com/images/ms/fcb84d980d95_C17D/ptreyeslighthouse_thumb.jpg" width="448" border="0"/></a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200707/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a1%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a8/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>15</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>देर से पहुंचती मनु संतानें</title>
		<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200704/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%81-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/</link>
		<comments>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200704/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%81-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 08 Apr 2007 21:13:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>
		<category><![CDATA[यायावारी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ms.pnarula.com/200704/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%81-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/</guid>
		<description><![CDATA[कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कंस्लटिंग के चलते बहुत सी कम्पनियों में काम करने को मिलता है। बहुत से लोगों का काम करने के वातावरण को देखने, उसमें घुलने मिलने को भी मिलता है। इसे ग्लोबलाईजेशन की दुर्घटना कहें या कुछ और लगभग सभी कम्पनियों में कम्पयूटर स्टाफ में अपने देसी भाई यानि भारतीय भी खूब मिलते हैं। भारतीय होने के अलावा एक और बात जो लगभग सभी जगह देसीभाईयों में एकरस देखने को मिलती है कि अपन लोग समय की कदर बहुत कम करते हैं। मीटिंग मे बहुधा लेट पहुंचते हैं और यदि मीटिंग सुबह के 8 बजे हुई तो समझ लो बज गई घंटी।</p>
<p>यह बात सिर्फ मीटिंग तक ही सीमित नहीं है। अपने सभी कार्यकर्म शादी-ब्याह पर पहुँचना, बच्चों की शिक्षक-अभिभावक मीटिंग, पिकनिक के लिए सुबह निकलना सब के सब एक आई एस टी यानि इंडियन स्टैंड्रड टाईम रोग से पीड़ित हैं। हालत यह है कि इसे अपने आचार विहार का अंग मान लिया गया है कि भैया हम तो ऐसे ही हैं। इंडियन स्टैंड्रड टाइम के हिसाब से 30 से 60 मिनट लेट ही पहुंचेगे। यह मैं अपने अमरीका में रहे पिछले 8-9 सालों के अपने व यहाँ देसी बिरादरी को देखते हुए लिख रहा हूँ। शायद देश में भी ऐसा ही हो। इस बारे में टिप्पणी में बताएं।</p>
<p>हम ऐसे कैसे हो यह मैं नहीं जानता पर शायद यह बिमारी नई ही है। अपने बड़े बूढ़ों को देखता हूँ तो सभी सुबह जल्दी उठने वाले व जल्दी सोने वालों में से हैं। अपनी नसल उल्टी है देर से सोती है व देर से उठती है। अब कौन सही है कौन गलत यह तो दर्शन का विषय है पर यह बात पक्की है कि समय की कद्र करनी चाहिए खासकर ऐसी जगहों पर जहाँ आप बहुत से देशों के लोगों के साथ काम कर रहे हों क्यूंकि आपसे आप के देश की पहचान होती है और आप यह तो न चाहेंगे कि मनुपुत्र जिनके बारे में दिनकर जी ने निम्न कविता लिखी थी दुनिया में आलसी लेटलतीफ के नाम से प्रसिद्ध हो</p>
<blockquote><p><strong>मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br />बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</strong></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200704/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%81-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>अमरीकी बनिया बुद्धि व समय</title>
		<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200703/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b5-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af/</link>
		<comments>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200703/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b5-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 12 Mar 2007 00:25:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ms.pnarula.com/200703/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b5-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af/</guid>
		<description><![CDATA[कहते हैं समय बड़ा बलवान, पर भाई मेरे ख्याल से अमरीकी समय से भी बलवान हैं। हर साल दो बार समय बदल देते हैं। मेरा इशारा है &#8220;डे-लाइट सेविंग्स&#8221;&#160;की तरफ।&#160;अभी आज सुबह&#160;समय एक घंटा आगे हो&#160;गया&#160;यानि कि स्प्रिंग अहेड&#160;या फिर&#160;बसंत&#160;उछाल।&#160;बसंत के आते ही सूरज&#160;थोड़ा पहले उगना&#160;शुरु हो जाता है व ज्यादा देर तक रोशनी रहती [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कहते हैं समय बड़ा बलवान, पर भाई मेरे ख्याल से अमरीकी समय से भी बलवान हैं। हर साल दो बार समय बदल देते हैं। मेरा इशारा है &#8220;डे-लाइट सेविंग्स&#8221;<a href="http://pnarula.com/images/ms/65f462278094_F4EB/springahead4.png" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="142" src="http://pnarula.com/images/ms/65f462278094_F4EB/springahead_thumb2.png" width="300" align="right" border="0"/></a>&nbsp;की तरफ।&nbsp;अभी आज सुबह&nbsp;समय एक घंटा आगे हो&nbsp;गया&nbsp;यानि कि स्प्रिंग अहेड&nbsp;या फिर&nbsp;बसंत&nbsp;उछाल।&nbsp;बसंत के आते ही सूरज&nbsp;थोड़ा पहले उगना&nbsp;शुरु हो जाता है व ज्यादा देर तक रोशनी रहती है।&nbsp;समय एक घंटा&nbsp;आगे करने से आप&nbsp;पुराने समय के हिसाब से&nbsp;सात बजे उठेंगे&nbsp;जबकि समय होगा आठ। हाय राम एक&nbsp;घंटा कहां गया। देसी भाईयों को इससे बड़ी परेशानी होती है। एक भाई तो अपना समय ही ठीक नहीं करता।</p>
<p>अब आते हैं बनिया बुद्धि पर। आम धारणा है कि इस मुई डे-लाइट सेविंग्स के पीछे बिजली बचाने का कारण है कि। लेकिन पते की बात है कि अगर लोग ज्यादा जल्दी घर वापिस जाएंगे तो वे खरीदारी करने बाहर निकलेंगे या फिर गोल्फ वगैरह खेलेंगे। अब ऐसा होगा तो कितने धंधों को फायदा होगा। बस इसी के चलते यह कहानी हर साल होती है।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200703/%e0%a4%85%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%b5-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>कैलिफोर्निया की लाइसेंस प्लेटें</title>
		<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200608/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%82/</link>
		<comments>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200608/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%82/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 04 Aug 2006 18:15:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ms.pnarula.com/200608/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%ab%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%a/</guid>
		<description><![CDATA[पूंजीवाद का सिद्धांत है कि यदि कोई किसी चीज के पैसा देता है तो वह चीज बाजार में आ जाएगी। यहाँ कैलिफोर्निया में सरकारी वाहन विभाग (DMV) जो कि आपके वाहनों का पंजीकरण व ड्राइविंग लाईसेंस वगैरह का काम करता है आप को अपनी कारों के लिए मनभावन लाइसेंस प्लेट नम्बर लेने देता है। जैसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पूंजीवाद का सिद्धांत है कि यदि कोई किसी चीज के पैसा देता है तो वह चीज बाजार में आ जाएगी। यहाँ कैलिफोर्निया में सरकारी वाहन विभाग (DMV) जो कि आपके वाहनों का पंजीकरण व ड्राइविंग लाईसेंस वगैरह का काम करता है आप को अपनी कारों के लिए मनभावन लाइसेंस प्लेट नम्बर लेने देता है। जैसे कि मैं अपनी कार के लिए MRCHSTH ले सकता हूँ। अब यहाँ कैलिफोर्निया में अपुन लोग (देसी बंधू) खूब हैं तो बड़े मजेदार नम्बर देखने को मिलते हैं। कुछ उदाहरण नीचे हैं</p>
<p>महाराणा प्रताप के चाहने वाले</p>
<p><img src="http://pnarula.com/images/ms/rajput-ca.jpg" /></p>
<p>पंजाबी भाई अमृतसरी भी पीछे नहीं है</p>
<p><img src="http://pnarula.com/images/ms/amrtsar-ca.jpg" /></p>
<p>कुछ और मस्त प्लेटे जो कि तेज ट्रैफिक में देखी पर फोटो न से सका &#8211; BHIMSAN, I<img src="http://www.utexas.edu/events/utremembers/2003/graphics/heart.gif" />SEEMA, INDIAN, WE<img src="http://www.utexas.edu/events/utremembers/2003/graphics/heart.gif" />INDA वगैरह।</p>
<p>कैलिफोर्निया वालों का <a href="https://vrir.dmv.ca.gov/ipp/PerLicensePlateServlet">वैबसाइट</a> है जहाँ पर आप जाकर देख सकते हैं कि कैसी कैसी प्लेटें संभव हैं। जरा मेरी दो मिनट की मेहनत देखिए। बस इस पर हर साल सामन्य पंजीकरण फीस (150 डालर मेरी कार के लिए) के अलावा 90 डालर और भी देने पड़ेगें। इन्हें वैनिटी प्लेटस भी कहते हैं</p>
<p><img src="http://pnarula.com/images/ms/ilovehindi-ca.jpg" height="204" width="400" /></p>
<p>यदि आपने भी कुछ मजेदार प्लेटें देखी हों या फिर देसी परिवेश में आप कोई मस्त नाम बताना चाहते हों तो यहाँ बताना न भूलें</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200608/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%82/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>10</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>डिब्बे वाले अब सिलकन वैली में</title>
		<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200603/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87/</link>
		<comments>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200603/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 18 Mar 2006 16:50:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[ऐसे ही]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ms.pnarula.com/200603/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%ac-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4/</guid>
		<description><![CDATA[शनिवार की सुबह है, और पहली खबर न्यूयार्क टाइम्स में पढ़ी की बम्बई के मशहूर डिब्बे वालों की जैसी लंच वितरण सेवा अब आमछी वैली में भी शुरु हो गई है। खबर के हिसाब से यह २००२ से चल रही है पर मुझे अभी ही पता चला। शुरु करने वाली हैं कविता श्रीवथसन। मजे की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>शनिवार की सुबह है, और पहली खबर न्यूयार्क टाइम्स में पढ़ी की बम्बई के मशहूर डिब्बे वालों की जैसी लंच वितरण सेवा अब आमछी वैली में भी शुरु हो गई है। खबर के हिसाब से यह २००२ से चल रही है पर मुझे अभी ही पता चला। शुरु करने वाली हैं कविता श्रीवथसन। मजे की बात है जब वे यहाँ आई थी तो खाना बनाना भी नहीं जानती थी और अब पंजाबियों को उनका साग पनीर, गुजरातियों की दाल रोटी, और दक्षिण वालों के लिए रासम इन्हीं के <a href="http://www.annadaata.com">अन्नदाता.कॉम</a> से जाता है। आप हफ्ते का मीनू इनके सजाल से देख सकते हैं और फिर क्रेडिट कार्ड से भुगतान भी कर सकते हैं।</p>
<p>अन्नदाता वैली की लगभग <a href="http://www.annadaata.com/locationsserved.htm">हर जगह</a> पर खाना पहुंचाते हैं। पर अपनी किस्मत देखिए अपने यहाँ सबसे आखिर में दोपहर के एक बजे के बाद (ब्रोका रोड) पहुंचते हैं। इतने तक तो अपने राम को बोलो राम हो जाएगा।  फिर भी खबर मजेदार है।</p>
<p>साभार: <a href="http://www.nytimes.com/2006/03/15/dining/15deli.html">न्यूयार्क टाइम्स</a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200603/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>आप्रवासी मन का चैन</title>
		<link>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200511/%e0%a4%86%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a8/</link>
		<comments>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200511/%e0%a4%86%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a8/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 19 Nov 2005 09:31:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://ms.pnarula.com/200511/%e0%a4%86%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a8/</guid>
		<description><![CDATA[बाहर रहते हुए कभी कभी कुछ विचार आते हैं जो कि मन को सालते हैं । व्यक्तिगत स्तर पर घर संबधियों की चिंता, क्या मैं एक अच्छा भाई, बेटा साबित हो रहा हूँ इत्यादि। इस स्तर से उठते हुए राष्ट्रीय स्तर पर यहां रहते हुए मैं देश के लिए क्या कर रहा हूँ। खासकर जब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बाहर रहते हुए कभी कभी कुछ विचार आते हैं जो कि मन को सालते हैं । व्यक्तिगत स्तर पर घर संबधियों की चिंता, क्या  मैं एक अच्छा भाई, बेटा साबित हो रहा हूँ इत्यादि। इस स्तर से उठते हुए राष्ट्रीय स्तर पर यहां रहते हुए मैं देश के लिए क्या कर रहा हूँ। खासकर जब आप जानते हैं कि आप आज जहाँ है वहां आप शिक्षा की वजह से ही हैं। शिक्षा के लिए तो देश का ऋणी ताजिंदगी रहना पड़ेगा। खासकर अतानू डे का <a href="http://www.deeshaa.org/who-actually-paid-for-my-education/">हू एक्चुली पेड फॉर माई ऐजूकेशन</a>(आखिर मेरी पढ़ाई के पैसे किसने दिए) पढ़ने के बाद। इस विचारावस्था से निकलने के दो उपाय जो हमेशा सोचता हूँ वे इस प्रकार हैं</p>
<ol>
<li>मैं एक सॉफ्टवेयर कन्सलटेंट हूँ। देश में रहता तो भी शायद किसी अमरीकी कम्पनी के लिए ही काम कर रहा होता। तो यहाँ और वहाँ काम करने में फर्क क्या है जब काम तो आखिरी में बाहर की कम्पनी के लिए ही करना है। यह जरुर मानता हूँ कि वहां रहते हुए खर्चा करता, इन्कम टैक्स देता। थोड़ा और उठें को कम्पनी भी खोल सकता था और दूसरे लोगों के लिए रोजगार पैदा करता। पहले मामले में जो कि व्यक्तिगत है में मेरे ख्याल से मेरे कहीं भी रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता जब दूसरे मामलें में जहाँ मैं कम्पनी खोल रहा हूँ अभी और चिंतन की जरुरत है । आने वाले दिनों में लिखूंगा। मेरा सोचने का रास्ता यही है कि गर कम्पनी खोलता तो भारत में ऑफिस जरुर होता।</li>
<li>दूसरा उपाय है जो कि मेरे मन को थोड़ा शीतल करता है वह है आप्रवासियों द्मारा देश वापिस पैसा भेजना। चाहे यह पैसा होता व्यक्तिगत स्तर पर ही है पर आता तो अपनी वित्त व्यवस्था में ही। इसके बारे में भी कभी कभी मन में संशा होती थी कि क्या हुआ जो हम यहाँ से पैसा भेजते हैं। पर आज <a href="http://www.sepiamutiny.com/sepia/archives/002547.html">सीपिया म्यूटनी</a> ने एक लेख के बारे में लिखा जो कि न्यू इकॉन्मिस्ट में छपा था &#8211; शीर्षक &#8211; <a href="http://neweconomist.blogs.com/new_economist/">आप्रवासी मायने रखते हैं</a>। वहीं से एक संक्षिप्ति<br />
<blockquote>
<p><em>With the number of migrants worldwide now reaching almost 200 million, their productivity and earnings are a powerful force for poverty reduction</em>. <em>Remittances, in particular, are an important way out of extreme poverty for a large number of people. The challenge facing policymakers is to fully achieve the potential economic benefits of migration, while managing the associated social and political implications.</em> </p>
</blockquote>
</li>
</ol>
<p>पर फिर भी इस पंछी को चैन तो वापिस जहाज पर जाकर ही आएगा। वह सुबह कभी तो आएगी। </p>
<p>अभी तो दादा बड़ा न भैया<br />सबसे बड़ा रुपइया</p>
<p>आप अगर बाहर रहते हैं व ऐसे विचार आप को तंग करते हैं तो आप मन को कैसे समझाते हैं या फिर आप के दिल को बहलाने को मिर्ची कौन सा ख्याल अच्छा है। </p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://ms.pankajnarula.webfactional.com/200511/%e0%a4%86%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%88%e0%a4%a8/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>6</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

