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	<title>मिर्ची सेठ &#187; अनुगूँज</title>
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	<description>मिर्ची सी जिंदगी, कभी मंदी कभी तेज</description>
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		<title>यदि भारत अमरीका हो जाए तो &#8211; श्वते-श्याम एडिशन</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Aug 2007 18:05:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>
		<category><![CDATA[आप्रवासी]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी]]></category>

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		<description><![CDATA[आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई &#8211; अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” प्रविष्टियां लिख डाली। बड़ी सी पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[</p>
<p><a href="http://pnarula.com/images/ms/7a8aa7ded6d3_9BFE/image03.png" atomicselection="true"><img style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="79" src="http://pnarula.com/images/ms/7a8aa7ded6d3_9BFE/image0_thumb1.png" width="163" align="right" border="0"/></a> आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई &#8211; अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” <a href="http://www.akshargram.com/2007/07/31/636/">प्रविष्टियां</a> लिख डाली। बड़ी सी पर जोर इस लिए दे रहा हूँ कि आलोक अपनी कम लिखे को ज्यादा समझना – तार को खते समझना जैसी ब्लॉग पोस्टों के लिए <strike>बदनाम</strike> प्रसिद्ध हैं। खैर अगर ऐसी कोई बात है तो मैं आलोक से इस खाने वाली चीज के बारे में जरुर जानना चाहुंगा। श्रीमती जी कैमिस्ट्री की रिसर्च-स्नातक हैं उनसे कह कर इस चीज के अंदर के विटामिन निकलवाकर – बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे।  </p>
<p>वैसे लिखना तो आलोक को पहले चाहिए था कि अमरीका उन्हें कैसा लगा। वैसा ही जैसा वे सोचते था या अलग। पर उन्होंने अपनी सोच की छिपकली सभी पर छोड़ दी अभी भाई लोग अनुगूंज में सोच सोच कर लिख रहे हैं। अब बड़े भाई ने कहा है तो लिखना तो पड़ेगा ही। तो लीजिए हमारी भी श्वेत-श्याम आहुति इस <a href="http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/">22वीं अनुगूंज</a> में। <span id="more-186"></span></p>
<p><strong>श्वेत संस्करण</strong> </p>
<p>जे कर अपणा भारत अमरीका बण जावे ते भाई घणा मजा आवे। सिस्टम काम करने लगेगा। बाबू भाई दफ्तर वाले बिना रिश्वत लिए ठीक टाइम पर बिना भाव खाए काम करने लगेगें। लोग बाग अपने शहर को अपना शहर समझने लगेंगे। कूड़ा कूड़े दानों में ही फैंकेगे व बस, रेलगाड़ी, राशन की दुकानों में आराम से बिना भगदड़ मजाए लाइन से लगेंगे। शहरों में सुंदर सुंदर पार्क होंगे व किताबों से भरी सार्वजनिक लाइब्रेरियां होंगी। नलों में हर समय पानी आएगा व बिजली साल छमाही में एक बार बता कर जाएगी। सड़के, गली के बल्ब एक निश्चित समय पर मरम्मत कीए जाएंगे न कि जब तक चल रहे हैं चलने दो जब टूट जाएंगे तो ठीक करेंगे। अदालते समय रहते काम करेंगी व सरकार लोगों की जिंदगी में थोड़ा कम दखल देगी। लाइसेंस राज और ज्यादा काबू में किया जाएगा। सरकार के खर्चे पारदर्शी होंगे।  </p>
<p><strong>श्याम संस्करण</strong> </p>
<p>भाई जे कर भारत ना अमरीका बण गयो – घणो मुसीबत आ जावे। डाक्टर पर जाणे से पहले लोग सो बार सोचें। ये नहीं कि जब मन किया चले गए। डाक्टर के पास जाने के बाद इंश्योरस वालों से लड़ें कि ये खर्चा कवर नहीं किया मैं इसके पैसे क्यूं दूं जब इंश्योरंस का प्रीमियम देता हूँ। बाप बेटे के बड़े होने पर सोचे की यार ये बाहर क्यूं नहीं जाता और घर पर रह रहा है तो किराया देना शुरु करे। पार्टी में जाएं तो आप का दोस्त अपने परिवार से कुछ इस तरह मिलवाए – यह है मेरी तीसरी बीवी, ये बिल्लू पिंकी मेरे बच्चे है, घसीटा मेरी बीवी का सुपुत्र है व ये टिनटिन हमदोनों की बेटी है। आदमी उमर के तकाज़े भूलने लगे – सात साल का बच्चा साठ साल के आदमी को नाम से पुकारे, साठ साल की आंटी टम्मी टक व ब्रेस्ट आग्यूमेंट कराकर कल्बों में प्राउल पर निकले। पूरे देश में सामान खरीदने की गिन 30-40 तरह की दुकाने होंगी। जहाँ जाइए हर जगह आप को टारगेट, कोल्स, बेस्ट बॉय, सर्किट सिटी, वालमार्ट मिल जाएगा। कोई विविधता नहीँ। मदरास की साड़िया, मथुरा के पेड़े, पंजाब का साग व गुजरात का खाकरा क्या होता है भाई।  </p>
<p>आज के लिए इतना ही। </p>
]]></content:encoded>
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		<title>हिन्दी चुटकले &#8211; अनुगूँज 21</title>
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		<pubDate>Sat, 15 Jul 2006 19:19:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[लॉयन व गब्बर के डर से लिख रहा हूँ यह प्रविष्टि। भाया धंधो चोपट थोड़े ही करना है मन्ने। ते लो जी मिर्ची सेठ उर्फ पंकज भाई अंबाले वाले की&#160;चुटकला यज्ञ में आहूति संता बंता पेड़ पर बैठे हैं। बंता गाना गाना शुरु कर देता है। चार पांच गाने गाने के बाद वह थोड़ा चुप [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" title="अनुगूँज 21" alt="अनुगूँज 21" align="right" height="79" hspace="10" vspace="2" width="163" />लॉयन </a>व <a href="http://www.akshargram.com/2006/07/12/553/">गब्बर </a>के डर से लिख रहा हूँ यह प्रविष्टि। भाया धंधो चोपट थोड़े ही करना है मन्ने। ते लो जी मिर्ची सेठ उर्फ पंकज भाई अंबाले वाले की&nbsp;<a href="http://www.akshargram.com/2006/07/04/549/"><span style="text-decoration: underline"></span>चुटकला यज्ञ </a>में आहूति</p>
<ol>
<li>संता बंता पेड़ पर बैठे हैं। बंता गाना गाना शुरु कर देता है। चार पांच गाने गाने के बाद वह थोड़ा चुप होता है व फिर चमगादड़ की तरह उलटा लटक कर फिर गाना शुरु कर देता है। संता पूछता है &#8211; ओ भाई की कर रिहा है। बंता &#8211; यार पहले साइ़ड ए के गा रहा था अब साइड बी के गाने गा रहा हूँ।</li>
<li>दो लड़किया बातें कर रही हैं। ए शीना, ए शीना ते को पता है जब लड़किया बातें कर रही होती हैं तो लड़को के कान खड़े हो जाते हैं। दूसरी लड़की &#8211; हैं बहन उसे कान भी कहते हैं। (यह जोक बाहरवीं में हमारे दोस्तों जैसे कम्पयूटर के मास्टर जी ने सुनाया था)</li>
<li>तमिल, गुजराती व पंजाबी इक्कठे काम करते हैं व रोज लंच पर मिलते हैं। तीनो एक ही तरह का खाना खा खा कर पक चुके होते हैं। तमिल कहता है कि गर कल फिर लंच में बीवी ने इडली रखी तो वह कूद कर जान दे दे गा। गुजराती कहता है कि अगर उसे फिर एक बार खाकरा खाने को मिला तो वह भी बनाने वाले के पास चला जाएगा। पंजाबी भी परांठों के बारे में यही विचार जाहिर करता हैं। अगले दिन तीनों मिलते हैं व लंच में वही देख कर तीनों कूद कर जान दे देते हैं। शम्शान में तीनों की बीवियाँ बात कर रही हैं। तमिल बीवी &#8211; हाय अगर मुझे पता होता कि ये इडली के कारण जान दे देंगे तो में उतपम्म बना कर भेजती। गुजराती &#8211; हाय मुझे भी खाकरा ले डूबा। हाय रे। आखिर में पंजाबी बीवी के चेहरे पर बहुत परेशानी के भाव हैं व वह कहती पर मेरे सरदार जी तो सुबह आप ही लंच बनाते थे।</li>
<li>एक ग्रामीण शहर में आ कर घूम रहा है व घूमने के बाद थक कर कुछ खाने की जगह ढूढंता है। शहर के बाहर बाहर होने की वजह से वहाँ कुछ मिलता नहीं और वह भटकता हुआ कचहरी पहुँच जाता है। उसे कचहरी के बारे में जानकारी नहीं होती और व किसी जिरह चल रहे केस की कार्यवाही में पहुँत जाता है। कार्यवाही के दौरान शोर मचने पर जज चुप कराने के लिए कहता है &#8211; ऑडर ऑडर। अपना ग्रामीण भाई &#8211; हाँ हाँ दो कुलचे ते इक छोलयाँ दी प्लेट (यह मेरा बचपन का सबसे पहला याद किया चुटकला है)</li>
<li>आजादी की लड़ाई के दिनों में महात्मा गाँधी के खादी प्रेम के चलते सभी को खादी ही प्रयोग करनी पड़ती थी। पंडित नेहरु को सर्दियों में लग गया जुकाम अब खादी का रुमाल होता है खुरदरा। बस जब नाक पोंछनी नाक पर खादी रेगमार जैसे काम करती। इस मारे नाक एक दम लाल हो गया। गाँधी जी ने नेहरु के लाल नाक को देख कर कहा कि &#8211; क्यूँ भई जूकाम कैसा है। नेहरु बोले &#8211; चिंता की बात नहीं आप के खादी के रुमालों से कुछ दिनों में नाक ही नहीं रहेगा फिर जुकाम ही न होगा।</li>
</ol>
<p>वैसे तो पाँच ही लिखना चाहता था पर हरियाणा वासी हूँ इसलिए बोनस में एक हरियाणवी चुटकला भी बनता है</p>
<p>लाँग रुट की बस का कंडक्टर एक गाँव वालो से बड़ा परेशान था। गाँव वाले हाथ देकर अगले गाँव जाने के लिए भी बस रुकवा लेते थे जबकि वह बस का स्टॉप भी नहीं था। अब बस जा रही है व वह गाँव आने वाला है। कंडक्टर पीछे से ड्राइवर को आवाज लगाता है कि &#8211; रै भाई इब के ना रोकिए, कोई रस्ते माँ हो तो सालयाँ ने पेल दिए। ड्राइवर भी जोश में आकर गाड़ी की स्पीड बढ़ा देता है। फिर क्या देखता है की गाँव आने पर एक बुढ़िया एक छोटे से लड़के, जिस ने सिर्फ बुशर्ट ही पहन रखी है, के साथ सड़के के बीचो बीच खड़ी है। ड्राइवर को गाड़ी में ब्रेक लगानी पड़ी जाती है। ड्राइवर थोड़ा सा साइड मार कर अपनी खिड़की से सर निकाल कर गुस्से में पूछता है &#8211; रै माई कित जा गी। बुढ़िया &#8211; ना बेटे जाणा तो कोनी, बालक रोवे था इसने भोपूं बजा के दिखा दे। &nbsp; &nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>अति आदर्शवाद &#8211; अनुगूँज १६</title>
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		<pubDate>Tue, 13 Dec 2005 04:45:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[स्वामी जी की अति-आदर्शवाद अनुगूँज प्रविष्टि में दी गई छवि जिस में कच्ची मिट्टी से कुम्हार घड़ा बना रहा है बड़ी ही उपयुक्त है। कच्ची मिट्टी यानि बच्चे जो कि भविष्य हैं का बनना इस बात पर निर्भर करता है कि कुम्हार रुपी माँ बाप उसे कैसे ढालते हैं। उपमा सही बन पड़ी है, इस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img width="163" height="79" align="right" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" alt="अनुगूँज १६" title="अनुगूँज १६" />स्वामी जी की <a href="http://www.akshargram.com/2005/12/03/515/">अति-आदर्शवाद अनुगूँज</a> प्रविष्टि में दी गई छवि जिस में कच्ची मिट्टी से कुम्हार घड़ा बना रहा है बड़ी ही उपयुक्त है। कच्ची मिट्टी यानि बच्चे जो कि भविष्य हैं का बनना इस बात पर निर्भर करता है कि कुम्हार रुपी माँ बाप उसे कैसे ढालते हैं। उपमा सही बन पड़ी है, इस बात में दम भी बहुत है। पर मानव की संतान और मटके में फर्क भी है। सबसे बड़ा कि मटका जड़ है व मानव चेतन है। मटका एक बार बन गया तो वह उसकी नियति है पर मानव समय के साथ साथ बदलता रहता है। लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि प्रारम्भिक शिक्षा व जिस ढांचे में आप डाल दिए जाते हो, आपके भविष्य की दिशा को निर्धारित करने में बहुत प्रभावी होता है।</p>
<p>तो क्या यह जरुरी है कि जो चीजे आचार व्यवहार आगे आकर मनुष्य की व्यक्तिगत व आर्थिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं शुरु से ही सिखाई जाए? यह आचार व्यवहार क्या हैं? यह बात तो पक्की है कि आप अपने बच्चों को सही बातें ही सीखाना चाहोगे। कुछ बातें सार्वभौमिक सत्य होती हैं। जैसे कि किसी की अकारण हत्या करना गलत है, चोरी करना ठीक नहीं है और कुछ सामान्य व्यवहार में प्रयोग होने वाली बातें जैसे कि झूठ बोलना गलत है, किसी को तंग करना अच्छी नहीं इत्यादि। सार्वभौमिक सत्य हमेंशा से हर समाज में सत्य रही हैं। हालांकि आप किन कारणों में हत्या गलत नहीं हैं पर चर्चा कर सकते हैं। पर हम अभी के लिए यह चर्चा फिर कभी के लिए रखते हैं। पर सामान्य व्यवहार की सीखों को हम रोजमर्रा की जिंदगी में ताक पर रख कर अपने फायदे की बात करते हैं। तो क्या बच्चों के ये बाते सीखाना बेमानी है? नहीं कभी नहीं। बच्चों को आप सदियों से सही माने जाने वाली बातें ही सीखाओगे। समय के साथ जब उनमें अच्छे बुरे को पहचानने की क्षमता आ जाएगी वे अपने आप ही अपना रास्ता ढूंढ लेंगे। </p>
<p>अब आते हैं ऐसी कौन सी बाते हैं जो मुझे लगती हैं जो मुझे समय के साथ साथ सीखते हुए बदलनी पड़ी। पहली यह कि सिर नीचे करके गधे की तरह मेहनत करते रहो परिणाम अपने आप अच्छे आ जाएंगे। मेहनत वाली बात ठीक थी पर गधे की तरह नहीं। आज के स्पर्धा भरे युग में कोई भी आपको बिना मांगे कुछ नहीं देता। गर आप सोचते हैं कि कम्पनी में मेहनत करते रहें और अच्छी चीजें आपके साथ होती रहेंगी तो आप गलती पर हैं। देवता जैसा आपका मैनजर हो वाली स्थिति को छोड़ कर आपको अपनी उन्नति के लिए स्वयं ही कुछ करना पड़ेगा। तो गर जिंदगी बिगड़ा हुआ बैल है तो इसे सींगों से पकड़कर अपने बस में करो। बैठे रहने से कुछ न होगा। कर्म करो और दिमाग से। दूसरी चीज जिससे अभी भी लड़ना पड़ता है कुछ भी कर के आगे बढ़ने की प्रवृत्ति की जगह सर्वे भवन्ति सुखिनः। आगे बढ़ने के लिए अपने सामने वाले की बर्बादी का मंजर सोचना अजीब लगता है। पर कम्पनियों में ऐसा खूब होता है। आज के जमाने में समाजवादी नीतियों की कम्पनियों कोई जगह नहीं। मरने मारने से डरना व्यर्थ है गर सामने वाला समझदार है तो वह बचेगा नहीं तो उसे धंधें में रहने की जरुरत नहीं।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>हम फिल्में क्यों देखते हैं &#8211; अनुगूँज १५</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Nov 2005 05:37:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[फिल्में देखने का शगल अंतर्राष्ट्रीय है। दुनिया में हर जगह फिल्में देखी जाती हैं। वहाँ भी जहां की फिल्म इंडस्ट्री अपने चरम पर है और वहां भी जहाँ फिल्में नहीं के बराबर बनती हैं। लेकिन एक बात पक्की है हर जगह फिल्मों के लिए लोगों का जज्बा बहुत भंयकर है। लोगो को फिल्मों के बारे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.akshargram.com/2005/11/15/507/"><img width="154" height="170" align="left" src="http://akshargram.com/images/anugunj-anniversary.png" alt="अनुगूँज - १५ वर्षगाँठ स्पैशल" title="अनुगूँज - १५ वर्षगाँठ स्पैशल" /></a>फिल्में देखने का शगल अंतर्राष्ट्रीय है। दुनिया में हर जगह फिल्में देखी जाती हैं। वहाँ भी जहां की फिल्म इंडस्ट्री अपने चरम पर है और वहां भी जहाँ फिल्में नहीं के बराबर बनती हैं। लेकिन एक बात पक्की है हर जगह फिल्मों के लिए लोगों का जज्बा बहुत भंयकर है। लोगो को फिल्मों के बारे में बात करनें में भी बहुत मजा आता है। जरा ब्लॉगजगत में देखिए कितने ही ब्लॉग इसकी गाथा गाते मिलेंगे। चाहे रमण जी की <a href="http://www.kaulonline.com/chittha/?p=71">नपी तुली समीक्षाएं</a> हो या फिर स्वामी जी की<a href="http://hindini.com/hindini/?p=62"> भभकती भाप</a> वाली, आप फिल्मों के बारें मे पढ़ता पाएंगे और जब कभी भी मेटरिक्स जैसी फिल्में आती हैं तो अंतर्जाल उस की कहानियां से अटा पाया जाता है <br />  तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हम फिल्में देखते क्यों है? वैसे देखा जाए तो फिल्म, पुराने जमाने के कथा वाचन व बाद में नौटंकी का ही परिष्कृत रुप है। कथा या कहानी सुनाना श्रोताओं को सपनों की दुनिया में ले जाने के बराबर ही है। सफल कथा भी वही होती है जिसमें रस आए। सामान्य तौर पर कह सकते हैं कि आदमी की पलायनवादी प्रवृत्ति से इसका जन्म होता है। आदमी कुछ समय के लिए अपने आस पास का सब कुछ भूलकर चंद लम्हे फंतासी की दुनिया में बिताना चाहता है। अब यह दुनिया चंद्रकांता की तरह मायावी भी हो सकती है या फिर ब्लैक की तरह क्रूर सत्य। यही कारण है कि एक वर्ग शतरंज के खिलाड़ी, कम्पनी, शिंडलर्स लिस्ट जैसी फिल्में पसंद करता है वहीं दूसरी और आप देखेंगे की लोग गोविंदा स्टाईल हल्की फुल्की हास्य व्यगंय वाली फिल्में देखना चाहते हैं। मर्जी सभी की अपनी अपनी है। पर यह गलत होगा कि एक वर्ग कहे कि हल्की फुलकी व्यंग्य फिल्में देखने वाले व्यक्ति बेकार हैं या फिर सीरियस फिल्में देखने वालों के बारे में कहें कि ये लोग तो सिरफिरे हैं। <br /> 
<div class="pullquoter">हम सभी पलायनवाद के चलते ही फिल्में देखते हैं। रंगीले पर्दे की कृत्रिम दुनिया में कहानी देखते वक्त आनंद आता है। अब यह हंसी का हो या वीर रस, करुणा या रहस्य का होता तो रस ही है।</div>
<p>  कई बार तो कुछ फिल्में आती हैं जो कि फिल्मकार केवल अपनी कला की अभिव्यक्ति के लिए बनाते हैं। पैरलल सिनेमा कुछ कुछ इसी वजह से ही है। ये बात और है कि ऐसे फिल्मकारों को चाहने वाले भी मिल जाते हैं। इस लिए फिल्म के बारे में समीक्षा देने से पहले यह भी देखना चाहिए कि कथाकार ने फिल्म किस के लिए बनाई थी। अब यश चौपड़ा जी की फैक्टरी में, उनकी नजरों में जो आदर्श परिवार, रिश्ते, बंधन होते हैं उसी के ऊपर फिल्में बनती हैं जिसे की जनता खूब दिल लगा कर देखती है। ये जनता को सपने दिखाने वाली बात है और जनता भी जानती है पर दिल के बहलाने को गालिब ये ख्याल अच्छा है  वाली बात है। वहीं राम गोपाल वर्मा ने कसम खा रखी है कि वे जनता को हर फिल्म से एक नई कहानी सुनाएगें व इसी पर एक्सपेरीमेंट करते रहते हैं। </p>
<p>  तो आखिर में यह तो निश्चित हैं कि हम सभी पलायनवाद के चलते ही फिल्में देखते हैं। रंगीले पर्दे की कृत्रिम दुनिया में कहानी देखते वक्त आनंद आता है। अब यह हंसी का हो या वीर रस, करुणा या रहस्य का होता तो रस ही है।</p>
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		<title>सत्संग की गति</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Sep 2005 18:30:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>pankaj</dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[अभी कुछ समय पहले एक ब्लॉग प्रविष्टि पढ़ी, बड़ी रोचक लगी। इस पर खूब मनन भी किया, हर चिट्ठाकार की तरह मन में विचार आया कि मौका लगते ही इस पर एक प्रविष्टि पेल दूँगा। अभी इस विचार को मन में घूमते हूए कुछ समय ही हुआ था कि राजेश जी सुमात्रा वालों ने अनुगूँज [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img class="alignright" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="अनुगूँज" /></a><br />
अभी कुछ समय पहले एक <a href="http://www.stevepavlina.com/blog/2005/07/overcoming-negative-emotions-and-boosting-motivation/">ब्लॉग प्रविष्टि</a> पढ़ी, बड़ी रोचक लगी। इस पर खूब मनन भी किया, हर चिट्ठाकार की तरह मन में विचार आया कि मौका लगते ही इस पर एक प्रविष्टि पेल दूँगा। अभी इस विचार को मन में घूमते हूए कुछ समय ही हुआ था कि राजेश जी सुमात्रा वालों ने <a href="http://www.akshargram.com/2005/09/01/467/">अनुगूँज तेहरवीं</a> की घोषणा कर दी।  पढ़ी गई प्रविष्टि का तात्पर्य था कि हम अपने शरीर की बेहतरी के लिए तो नाना प्रकार के व्यायाम करते हैं, करते हैं न, पर मन की बेहतरी के लिए कुछ भी नहीं करते। हर तरफ से जो इनपुट आ रही है बस लिए जा रहे हैं। कभी प्रयास नहीं करते की कुछ अच्छा जाए दिमाग में। तो मन के बेहतरी के लिए क्या – सत्संग। यानि अच्छे लोगों का साथ। उनके विचारों का आत्मसात। यही सत्संग विषय है इस अनुगूँज का।</p>
<p>इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि सत्संग जरुरी है। सत्संग की महत्ता हमारे समाज में रची बसी है। शादी जो कि किसी भी समाज के अभिन्न अंग है के समय आर्थिक समन्वय के अलावा यह भी देखा जाता है कि कैसे लोगों की बीच उठना बैठना है। शोले का अमिताभ, धर्मेन्द्र का कोई भी अवगुण न मानकर सारी बात दोस्तों के संग पर ही डाल देता है। बचपन से माँ बाप इस बात पर बहुत ध्यान देते हैं के बच्चे किस किस के साथ घूम रहे हैं। माँ की बचपन में कही गई एक बात अब भी याद है और वेगास जाते वक्त अब भी याद कर लेते हैं – “विक्की कौडियाँ नाल खेडदे खेडदे मोहरां नाल वी खेलनां आपे शुरु कर देंदे नें”। विक्की मेरे घर का नाम है और माँ कह रही है कि बेटा जिन दोस्तों के साथ आज तुम कौड़ियों से जूआ खेल रहे हो कल उन्हीं के साथ पैसे से भी खेलना शुरु कर दोगो। कुसंग की गति ऐसी ही है। लास वेगास की बात शुरु हुई है तो एक और बात बताता हूँ। इतने बड़े स्केल पर जूआ, शराब, शबाब होते देखकर अच्छे अच्छे पशोपश में पड़ जाते हैं कि यार इतने लोग कर रहें हैं तो इसमें क्या बुराई है। अपन भी कर के देखते हैं। सिग्रेट पीने वाले तो इस बात के गवाह हैं कि सिग्रेट संगति से ही आरम्भ होती है।</p>
<p>यहीं पर बुराई और अच्छाई पर एक बात कहना चाहुँगा कि बुराई हमेंशा अच्छी लगती है, अपनी तरफ बुलाती है, अपने से चिपका कर रखना चाहती है। जबकि अच्छाई का रास्ता तो कंटकपथ है। याद कीजिए जिंदगी में कितनी बार आप दौराहे पर खड़े हुए हैं और आप ने कौन सा रास्ता अख्तियार किया। यहाँ याद आती है अल पचीनो की सेंट ऑफ अ वुमेन। फिल्म के अंत में अंधा लेफ्टीनेंट कर्नल फ्रैंक स्लेड(पचीनो) स्कूल कमेटी के सामने अपने नौजवान साथी चार्ली की सत्यता व अच्छाई बुराई के बारे में कहता है</p>
<blockquote><p>
मैं जिंदगी में बहुत बार दौराहों पर आया हूँ। मुझे हमेंशा पता था कि सही रास्ता क्या है। मुझे पता था, बिना किसी शक के, लेकिन मैंने कभी भी सही रास्ता नहीं चुना। जानना चाहते हैं क्यूँ? सही रास्ता बहुत ही मुश्किल था। और यहाँ चार्ली को देखिए। वह भी दौराहे पर खड़ा है। उसने भी रास्ता चुना है। यह रास्ता सच व सच्चाई का है। यही रास्ता उसूलों का है जिससे कि आदमी का चरित्र बनता है।
</p></blockquote>
<p>(अनुवाद की गलतियाँ मेरी, मूल <a href="http://velvet_peach.tripod.com/fpacscentofawoman.html">यहाँ देखिए</a>।)</p>
<p>तो यह तो स्थापित है कि सत्संग श्रेयस्कर है और सत्संग आसानी से नहीं मिलता उसके लिए मेहनत करनी पड़ती है। पर क्या सिर्फ सत्संग काफी है? बिल्कुल नहीं। मनसा वाचा कर्मणा यानि मन, वाणी व कर्म तीनों का सदूपयोग ही समाज का भला कर सकता है। मैं कितना भी उपदेश दे दूँ पर यदि खुद कर्म से उस का पालन नहीं करता यानि आचरण में नहीं है तो भूल जाओ कोई और या मेरे बच्चे वैसा करेंगे। थोड़े दिन पहले ही किसी ने कहा था आज कल माँ बाप स्वयं टीवी से जुड़े रहते हैं फिर कहते हैं कि बच्चे खेलते नहीं इस उमर में खेलना जरुरी है। अरे भाई बच्चों का जैसा संग होगा वैसा ही करेंगे न। लाला दुकान पर बैठा कितने भी घोटाले करता रहे, पर मंदिर में जाकर दान देने से या यह कहने से कि भूल चूक माफ करना, मुक्त नहीं हो सकता। धंधा है पर गंदा है कह कर अपनी कमजोरी को छुपाना गलत है। सत्संग ही काफी नहीं उसे आचरण में भी लाना पड़ेगा। श्री राम जी का उदाहरण आचरण के संदर्भ में उत्तम है। मनसा वाचा कर्मणा। कंटकपथ पर अडिग। बस ऐसे ही।</p>
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		<title>दस बहाने कर के लिख गया दिल &#8211; अनुगूँज संख्या १२</title>
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		<pubDate>Fri, 02 Sep 2005 04:53:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator></dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>
		<category><![CDATA[दर्शन]]></category>

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		<description><![CDATA[वैसे तो अनुनाद जी आयोजित अनुगूँज १२ का प्रसाद बंट चुका है पर अपुन भी अपनी खिचड़ी पका के ही मानेगें। आज मन में जो विचार आए पेल दिए। तो लीजिए हाजिर हैं दस विचार १. अवगुण नाव के पेंदे में हुए छेद के समान है जो अंततः नाव की तरह आदमी को डुबो ही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>वैसे तो अनुनाद जी आयोजित<a href="http://www.akshargram.com/2005/08/31/466/"> अनुगूँज १२</a> का प्रसाद बंट चुका है पर अपुन भी अपनी खिचड़ी पका के ही मानेगें। आज मन में जो विचार आए पेल दिए। तो लीजिए हाजिर हैं दस विचार<br />
<a href="http://akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img class="alignright" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="अनुगूँज" /></a><br />
१. अवगुण नाव के पेंदे में हुए छेद के समान है जो अंततः नाव की तरह आदमी को डुबो ही देता है।</p>
<p>२. न विषादे मनःकार्यम् विषादो दोष वतरः, विषोदो हन्ति पुरुषम् बालं क्रुद्ध इवोरगः – मन को विषाद ग्रस्त नहीं करना चाहिए (मतलब कि भाई टेंशन मत ले यार), विषाद में बहुत दोष होते हैं। विषाद से आदमी का नाश हो जाता जैसे कि क्या क्रुद्ध सांप बच्चे को नहीं काटता।</p>
<p>३. राक्षसों के साथ व्यवहार करते समय बहुत सावधानी बर्तनी चाहिए, अन्यथा आप भी वैसे हो जाते हो। फ्रेडरिक निची (अब तक छप्पन इसी सुभाषित से आरम्भ होती है)</p>
<p>४. आदमी को सिर मुंडवा कर, बीच बाजार में घड़ा फोड़कर, या अपने कपड़े फाड़ कर किसी न किसी तरह से प्रसिद्धि अवश्य पानी चाहिए – बड़ी बहन की एम ए संस्कृत पुस्तक से पुराना व्यंग्य</p>
<p>५. आदमी को अपनी उमर नम्रता से स्वीकार करनी चाहिए। (अमरीका में इस की बड़ी प्राबल्म है बुड्ढे षोडशियों के साथ घूम रहे होते हैं व बुड्ढियाँ फेस लिफ्ट व छातियाँ प्लास्टिक से फुलवा कर घूम रही होती हैं)</p>
<p>६. मजे करने व खुशी का अंतर आदमी को आते आते आता है। (अमरीका में साथ काम करती बंदी के शब्द &#8211; हम लोग नए नए आए थे व हर हफ्ते के आखिर में कहीँ न कहीं भाग जाते थे। तो यह बंदी जो उमर में हम से बड़ी थी से हमने एक सोमवार पूछा कि आप इस हफ्ते कहाँ गई। तो एक बार उसने कहा कि मैं अब ज्यादा कहीं नहीं जाती। मैंने जवानी मे बड़े मजे किए हैं पर मैं अब अपने परिवार संग खुश हूँ)</p>
<p>७. दुनिया दिखावे से भी डरती है – चाणक्य</p>
<p>८. <a href="  http://hindi.pnarula.com/haanbhai/archives/2005/08/27/मैं-कौन-हूँ/">अहम् ब्रहमोस्मि</a></p>
<p>९. चांद की कामना जरुर करो पर वहाँ तक जाने के लिए सीढ़ी भी बनाने के लिए तैयार रहो।</p>
<p>१०. कोई भी संबन्ध शुरु से ही परिपूर्ण नहीं होता, आप किसी एक जगह से शुरु करते हो फिर परस्पर सौहार्द से ही उसे परिपूर्ण बनाते हो &#8211; जो शादी करने वाले हैं उनके के लिए यह मेरे एक पुराने मैनेजर के कथन हैं जो उसने उस समय कहे थे जब मुझे शादी के लिए कन्या का चुनाव करना था। देखिए इस बात को कहे भी तीन बरस बीत गए।</p>
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		<title>११ वीं अनुगूँज-माज़रा क्या है?</title>
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		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 04:48:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator></dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[अनूप भैया ने अपनी चिकाईगरी की शैली में लिखा कि माजरा क्या है। कहते हैं कि जो मन में आए लिखो और जाते जाते मेरे खाली दिमाग की खाली दीवारों पर स्याही भी(painting the mind) पोत गए कि मर्जी आप की है पर इंडिया शाइनिंग और मेरा भारत परेशान पर भी लिख सकते हो। अब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="माजरा क्या है??" /><a href="http://fursatiya.blogspot.com">अनूप भैया</a> ने अपनी चिकाईगरी की शैली में लिखा कि <a href="http://www.akshargram.com/2005/06/01/437">माजरा क्या है।</a> कहते हैं कि जो मन में आए लिखो और जाते जाते मेरे खाली दिमाग की खाली दीवारों पर स्याही भी(painting the mind) पोत गए कि मर्जी आप की है पर इंडिया शाइनिंग और मेरा भारत परेशान पर भी लिख सकते हो। अब अनूप जी की मैं बड़ी इज्जत करता हूँ काश वे मेरे अम्बाला में होते तो मेरे भाई साहिब यानि बड़े मिर्ची सेठ से भी मिली आते। इसी बहाने भाई साहिब इन्हें एक आध मिर्ची की बोरी भी टिका देते कि यार अपने मुहल्ले के लाला को दे देना। कुछ बिक्री भी हो जाती। तो जैसे ही इस अनुगूँज का विषय पड़ा लगा मूली के पराँठे खाने का मूल्य चुकाने का टाईम आ गया है। इस बार लिख डालूँगा। ससुरा अमरीका में अभी २९ है अनूप जी के यहाँ तो ३० भी हो गई। गर अभी नहीं लिखा तो मार पड़ सकती है। आशा करते हैं कि <a href="http://thelwa.blogspot.com">ठलुआ जी</a> के कान इस बार पक्के खींचे जाएगें। गर वे पढ़ रहैं हैं तो भईया चंद घंटे बाकी हैं लिख मारो नहीं तो अजातशत्रु का कोपबाण<a href="http://earth.google.com"> गूगल अरथ</a> से धूमता हूआ आता ही होगा।<br />
<span id="more-98"></span><br />
हाँ जी तो पहले माजरा यह है कि मैं बहुत बड़ाँ ढोंगी हूँ और जानता हूँ कि आप भी हैं। मैं सारे दिन एक मंगल को छोड़ कर चिकन खा लेता हूँ। कोई पूछे भईया क्यूँ मंगलवार को खाने वाला चिकन क्या मंत्रोचारण से काटते हूए शुद्ध तरीके से काटा गया था। पर क्या करुँ माँ कहती है मंगल भारी है। श्रीमती जी को भी अपनी तरफ मिला लिया है। हर मंगल पेशी होती है कि आज दोपहर में क्या खाया था। तो बस मंगल का चिकन नहीं खा सकते। देखा मेरा ढोंग। अपने ढोंग के बारे में टिप्पणी या अपने चिट्ठे पर प्रविष्टि करके बताने को आपको सादर निमंत्रण है।</p>
<p>इंडिया शाईनिंग ओर भारत परेशान के बारे में सोचता हूँ तो एक अंग्रेजी भैया हैं उनके लिखे की याद आती है। नाम है <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Alvin_Toffler">एलविन टॉफलर</a>। सोचनें में इन्हें पक्का स्वर्ण पदक मिला होगा। इनकी पढ़ी पुस्तकों से लोग आडडिया लेकर पार्टी वगैरह में थोड़ा बुद्धिप्रदर्शन कर लेतें हैं। यह तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं ढोंगी हूँ। इन्हीं मिंया की एक पुस्तक हैं थर्ड वेव जिस में यह मानव के विकास में आई तीन लहरें अथवा वेव्स के बारे में बात करते हैं। यदि इन महाशय की सोच उधार ले कर सोचा जाए तो माजरा क्या है थोड़ा बहुत समझ में आता है।</p>
<p>पहली लहर थी कृषि की, फिर आई औद्योगिक लहर और इसके उपरांत आई सूचना लहर। तो इन अलग अलग लहरों के घटने का समय अलग अलग था अपने पश्चिम में। वैसे भी भारत के स्वर्ण युग को तो हम गिन ही नहीं सकते और मैं लार्ड मैकॉले की शिक्षा नीति का अधपक्का उतपाद हूँ। खैर वह अलग बात है। कृषि लहर के लोग मिट्टी के धरों में रहते थे उनकी सोच भी मिट्ठी से जुड़ी थी। बड़े बड़े परिवार थे सब मिल जुल कर रहते थे। माँ बाप बच्चों से प्यार करते थे व उनकी ताजिंदगी देखभाल करते थे। बच्चे भी माँ बाप के बुढ़ापे की लाठी होते थे। फिर आई औद्योगिक लहर। लोग फैक्टरियों में आ गए। परिवार बस माँ बाप और बच्चों तक सीमित हो गए। बाप बेटे से बड़े होने पर घर में रहने पर किराए के बारे में सोचने लगा और बाप भी बच्चों के घर फोन करके व बेटे के अलग शहर में रहने पर होटल में रहने लगा। तलाक का शब्द भी गलियों में बड़ा गूँजने लगा। फिर आई सूचना लहर इहाँ तो मजे ही मजे हैं। एकदम प्राइवेट लाईफ है। बस कान पर आई पोड लगाया और अपनी ही दुनिया में मग्न। शादी की नहीं क्यूँकि कमिटमेंट माँगती है। बच्चों की जगह कुत्ते पाल लिए क्यूँकि कुत्ते को तो बस पहले साल ट्रेन करना पड़ता है फिर सारी उमर वैसे का वैसा। बच्चे का बचपन अलग, पढ़ाई फिर जवानी और पता नहीं क्या क्या। कुत्ते ही अच्छे हैं।</p>
<p>तो भाया उपर की तीनों लहरों के होने के समय़ पश्चिम में लगभग अलग अलग हैं। पर हुआ क्या कि चरक, आर्यभट्ट, पाणिनी, कालिदास, चाणक्य और चंद्रगुप्त के इस भारत में मुगलों के आने से थोड़े पहले से ही अंधकार छा गया और हमने कृषि युग से फिर से शुऱूआत की। अंग्रेज अपने साथ कुछ उद्योग भी लाए पर माल बहुत ले गए अपने यहाँ से। और यह सीमित भी रही गिने चुने लोगों तक। पता नहीं कैसे धक्के से हम लोग सूचना लहर में घुस गए। आज यह है हि कि अपने यहाँ हाई क्लास, अपर मिडल क्लास, मिडल मिडल क्लास, लोअर मिडल क्लास, लोआर क्लास के साथ हम लोग तीनो लहरों में जी रहे हैं। बैंगलोर में लोडे आई पोड लगा कर घूमते हैं, जबकि अपने अम्बाला में अभी भी बर्फ बाजार में बिकती है और बर्फ के कारखाने भी हैं। थोड़ा दूर गाँव चला जाऊं तो मिट्टी के धर बनाती औरते भी मिल जाएंगी। पर टी वी हर जगह हैं। इस से बड़ी मजेदार संस्कृति पैदा हो गई है। मुहल्ले की प्रिया आंटी घर में तो मैक्सी पहन कर धूमती हैं पर गली में सब्जी लेने वाला आए तो दुपट्टा ओढ़ कर बाहर आ जाती है। बच्चे आज कल लव अफेयर तो खूब चलाते हैं पर शादी फिर भी बड़े दहेज के साथ माँ बाप के कहने पर करते हैं।</p>
<p>अब कैसे न कहें माजरा क्या है।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>शिक्षा: आज के परिपेक्ष्य में</title>
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		<pubDate>Fri, 25 Mar 2005 05:01:43 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि शिक्षा हमेंशा से महत्वपूर्ण रही है। देखा जाए तो शायद शिक्षा आदि काल से ही मनुष्य के लिए आवश्यक रही होगी। सोचिए इस आदि मानव की जिसने पहली बार अग्नि देव प्रसन्न किए होंगे। इस अद्भुत शिक्षा से उसे कितने आनंद की प्राप्ति हुई होगी। फिर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg"/> इस बात में तो कोई  दो राय नहीं कि शिक्षा हमेंशा से महत्वपूर्ण रही है। देखा जाए तो शायद शिक्षा आदि काल से ही मनुष्य के लिए आवश्यक रही होगी। सोचिए इस आदि मानव की जिसने पहली बार अग्नि देव प्रसन्न किए होंगे। इस अद्भुत शिक्षा से उसे कितने आनंद की प्राप्ति हुई होगी। फिर आगे चल कर अपनी भारतीय संस्कृति में तो इस विषय पर सैंकड़ों श्रुतियाँ-श्लोक कहे गए हैं। पर कल और आज में शिक्षा के महत्व में कुछ परिवर्तन आया है या अभी भी इसका महत्व उतना ही है जितना कल था।<br />
<span id="more-87"></span><br />
शिक्षा के मायने विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न होते हैं। ज्यादातर तो इसे आजिविका का साधन ही माना जाता है। पर अगर ऐसा है तो क्या माना जाए कि अमीर माँ बाप या फिर आज के भारत के नेता की औलादों को शिक्षा की आवश्यकता नहींं है। पर ऐसा नहीं है क्योंकि अगर औलाद नालायक है तो बड़े से बड़े कारूं का खजाना खत्म हो सकता है। यहाँ से हमें इस महत्व की पहली झलक मिलती है कि शिक्षा का मायना आर्थिक तो कतई नहींं है। समाज में उठना बैठना, शिष्टाचार भी इसी शिक्षा का भाग माने जाते है। तो क्या मानें कि केवल फोकी शिष्टता से हम अपना जीवन काट सकते हैं? और चलिए मान लिया कि आदमी के पास पैसा बनाने का साधन भी है और माँ बाप ने अच्छा संस्कार भी दिए हैं पर फिर भी व्यक्ति चिंता बहुत करता है कि कल क्या होगा या फिर किसी भी बात और बात पर घुनता रहता है। तो लगता है कि शिक्षा को संतोष भी सिखाना चाहिए।</p>
<p>अभी कुछ दिन अहले <a href="http://www.deeshaa.org/archives/2005/01/10/">अतानू दा</a> <a href="http://www.amazon.com/exec/obidos/ASIN/0553208845/102-7910253-7980128">सिदार्थ</a> नामक उपन्यास के बौद्ध भिक्षुक की कहानी सुना रहे थे कि कोई इस भिक्षुक से पुछता है कि उसने अब तक क्या सीखा है। इस पर भिक्षुक उत्तर देता है कि उस की सारी शिक्षा में उसने केवल तीन हही चीजे सीखी हीं &#8211; सोचना, इंतजार करना, व व्रत करना। अहा क्या विचार हैं। कितने सरल शब्दों में मेरी पहले कही गई सारी बातें कह दी। अगर मैं सोच सकता हूँ तो धनोपार्जन, इज्जत सब मेरे पास होंगे। इंतजार करना पाना भी बड़ा बात है। एक रस होकर किसी काम को करना व आराम से उस के फल की प्राप्ति ही कहा था न अर्जुन से कृष्ण नें। व्रत करने की प्रवृत्ति, अनुशासन और दुनिया में कम से कम वस्तुओ पर भी गुजारा कर लेने की क्षमता बताती है।</p>
<p>तो बस यही है शिक्षा का अभिप्राय कल भी और आज भी।</p>
<p>आप को मेरी यह प्रविष्टि कैसी लगी, जरा नीचे सितारों के जरीए अवश्य बताएं।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>मेरा चमत्कारी अनुभव &#8211; छठी अनुगूँज</title>
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		<pubDate>Wed, 23 Feb 2005 06:08:16 +0000</pubDate>
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				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[रमण जी ने चमत्कारी अनुभव की गूँज कराके फिर से विचारों के दो राहे पर ला पटका है। एक तरफ विज्ञान-आभियांत्रिकी में शिक्षित दिमाग यह मानने को तैयार नहीं है कि ऐसी कोई चीज हो सकती है तो दूसरी तरफ दाँया मस्तिषक कहता है कि मूढ़ अगर तेरी सोच में कुछ बात नहीं बैठती तो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="rightalign" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="छठी अनुगूँज" /> रमण जी ने <a href="http://www.akshargram.com/2005/02/18/182/">चमत्कारी अनुभव</a> की गूँज कराके फिर से विचारों के दो राहे पर ला पटका है। एक तरफ <a href="http://vigyaan.blogspot.com">विज्ञान</a>-आभियांत्रिकी में शिक्षित दिमाग यह मानने को तैयार नहीं है कि ऐसी कोई चीज हो सकती है तो दूसरी तरफ दाँया मस्तिषक कहता है कि मूढ़ अगर तेरी सोच में कुछ बात नहीं बैठती तो जरुरी नहीं कि सत्य न हो। भाग्य कहें या दुर्भाग्य अपने साथ ऐसी बात कभी हुई नहीं। तो इसका ये मतलब नहीं कि भाई कुछ लिखेगा नहीं। आप को एक कथा सुनाते हैं। सुनी हो तो पढ़के माफ कर देना।</p>
<p>बात उन दिनों की है जब हम ग्यारहवी कक्षा में थे। माँ बाप ने आठवीं के बाद से होस्टल में डाल दिया था इसलिए रहते भी वहीं थे। होस्टल व स्कूल दोनों ही पहाड़ी इलाके में थे। हमउमर लड़कों के चलते खूब शरारते होती थी। कभी होस्टल की दिवार फाँद कर भाग जाना और शाम ढले छुपते छुपाते आना तो कभी किसी लड़के का सामान गायब करके उसे परेशान करना।</p>
<p>स्कूल में खेल कूद का भी खूब जोर था। हमतो खैर पढ़ाकू बच्चे चश्मा पहलवान थे पर कुछ लड़के काफी तेज थे। किसी इतफाक से अपने यहाँ कुश्ती प्रसिद्द थी। साल में छह सात लड़के राष्ट्रीय स्तर भी कुश्ती खेल आए थे। इसके कारण स्कूल वालों ने बढ़िया व्यायाम शाला बनवा दी थी। एक नया कोच भी रखा गया। जो कि खुद एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुका था। नए कोच के आने से कुश्ती वाले लड़के तरह तरह के करतब करते पाए जाते। कभी मिट्टी एक कोने से खोद कर दूसरी जगह लगा रहे होते तो कभी भागते भागते बीच में रुक कर बैठक लगा रहे होते। ऐसे ही एक दिन हम लोग शाम को खेल रहे थे कि खबर आई कि जिम में एक लड़के की कुश्ती में गलत दाव पड़कर गर्दन की डिस्क टूटने से मौत हो गई है। बुरी खबर थी, होस्टल में वैसे इतना भाईचारा होता है, मूड बहुत दिनों तक खराब रहा। स्कूल वालों ने अपनी तरफ से स्कूल के पीछे के बाग में लड़के के नाम का संगमरमर का चबूतरा बनवा दिया।</p>
<p>कुछ दिन बीते सर्दियां भी आ गई, पहाड़ों में वैसे सर्दी ज्यादा होती है। एक बात फैलनी शुरु हो गई कि बाग में अंधेरा पड़ते ही चबूतरे के पास मृत लड़के की आत्मा आती है। बाग में लोग सर्दियों की वजह से वैसे ही कम जाते थे इस बात के चलते लोग बिल्कुल ही जाना बंद हो गए। एक दिन रात में हम सभी सर्दी से ठिठुरते शालें लपेटे बाते कर रहे थे कि इसी बात पर चर्चा शुरु हो गई। कुछ मानने वाले थे और कुछ न मानने वाले। अब चाहे मैं चश्म-पढ़ाकू था पर विचार रखनें में बहुत मुखर था। हम भी अड़ गए कि ऐसा कुछ नहीं होता। तो लोगों ने कहा कि ऐसी बात है तो रात के अंधेरे में वहाँ पर अकेले जाकर दिखाओ। हमें लगा कि फंस गए बेटा। मानना न मानना अलग बात होती है पर अंधेरे का डर अलग बात होती है। लड़कों ने इसे इज्जत का सवाल बना दिया। मानना पड़ा तय हुआ कि सुबूत के तौर पर चबूतरे के पास कील गाढ़ कर आनी थी।</p>
<p> वीर बालक बनते हुए अपुन भी अंदर से डरते डरते बाग की ओर बढ़ लिए। बाग में पहला कदम रखा और घुप्प अंधेरा देख कर सिट्टी गुम हो गई। ऊपर से चलते हुए पैरों के नीचे आ रहे सूखे पत्तों की चरमराहट अजीब डरावना माहौल पैदा कर रही थी। राम राम करते चबूतरे तक पहूँचे व मन में सोचा कि चाहे इन बातों में न मानूं पर डींगे नहीं हाकूँगा। कील गाढ़ने के लिए झुके तो हथोड़ी हाथ से छूट गई। अंधकार में छन्न की आवाज हूई। ठंड से ठिठुरते हाथ से शाल संभालते हूऐ हथोड़ी उठाई और हनुमान का नाम ले कर कील जमीन में ठोक दी। काम पूरा हो चुका था और हम मुड़े और मुड़ कर जाने लगे। पर यह क्या लगा किसी ने पीछे से शाल पकड़ कर रोक लिया हो। अपनी तो पतली हो गई। लगा कि आज तो प्राण गए। आव देखा न ताव गोली की तरह होस्टल की तरफ भाग लिए। हाँफते हाँफते वापिस पहुंचे तो लड़को ने पूछा कि गाड़ आए क्या हमने कहा कि कील तो लगा आए पर हो सकता है आप की बात सच्ची हो। अगले दिन सुबह खबर मिली कि बाग में एक कील से ज़मीन में ठुकी शाल मिली है।</p>
]]></content:encoded>
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		<title>चौथी अनुगूँज &#8211; श्री लालू प्रसाद यादव</title>
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		<pubDate>Thu, 30 Dec 2004 06:23:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator></dc:creator>
				<category><![CDATA[अनुगूँज]]></category>

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		<description><![CDATA[जब अतुल ने लालू जी का विषय रखा तो सोचा कि अच्छा है खूब लिखेंगे। पर जब लिखने बैठा तो पता लगा कि मैं जितना जानता हूँ सब मीडिया की दी हुई सोच है। कभी बिहार जाने का मौका नहीं लगा। जो पता था वह यह कि बड़े मसखरे किस्म के घाघ नेता हैं जोकि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जब अतुल ने <a href="http://akshargram.com/2004/12/20/114/">लालू जी </a>का विषय रखा तो सोचा कि अच्छा है खूब लिखेंगे। पर जब लिखने बैठा तो पता लगा कि मैं जितना जानता हूँ सब मीडिया की दी हुई सोच है। कभी बिहार जाने का मौका नहीं लगा। जो पता था वह यह कि बड़े मसखरे किस्म के घाघ नेता हैं जोकि पता नहीं कितने सालों से बिहार पर अपना राज्य जमाए हुए हैं। येन केन प्रकारेण कुर्सी बचा के रखे हैं। गर किसी कंपनी को चलाने के लिए कोई मैनेजर चुनना होता है तो देखते हैं कि वह कम्पनी के हित में काम करेगा के नहीं, ऐसा न होने पर उसे बाहर की राह दिखा दी जाती है। नेता भी राज्य का हित जो कि जन हित में है के लिए चुने जाते हैं पर यहाँ तो स्वहित सबसे पहले होता है। खैर इतनी सीमित सोच के बाद सोचा कि जब खुद कुछ समझ न आए तो बड़े क्या कहते हैं इस बारे में पता करना चाहिए। इंद्र शर्मा जी बड़ी ही परिपक्व सोच के ऐसे ही व्यक्ति हैं। हिंदूस्तान मोटर्स से सेवानिवृत हो कर वे आजकल <a href="http://drishtikona.com">दृष्टिकोण</a> नाम का चिट्ठा लिखते हैं। बड़ा उपयुक्त व मार्गदर्शक ब्लॉग है उनका। वहीं पर उन्होंने लालू जी को एक <a href="http://www.drishtikona.com/archives/rural_development/000082.php">मुक्त पत्र </a>लिखा था जिस का यहाँ हिंदी अनुवाद कर रहा हूँ। मैंने विभिन्न माध्यमों द्मारा यह अनुवाद करने के लिए उनकी अनुमति लेनी चाहि पर उनसे संपर्क न बन पाया। आशा है वे इसके लिए बुरा न मानेगे। एक और बात यह पत्र मई के महीने में लिखा गया था इसलिए कई चीजें बदल चुकी हैं।</p>
<p><strong>प्रिय लालू जी &#8211; बिहार के बेताज राजा </strong> <span id="more-71"></span><br />
मेधापुर की सफलता की बधाई स्वीकार करें और छप्परा के स्थगित चुनाव जो कि एक खोज का विषय है की लगभग पक्की जीत के लिए पहले से बधाई स्वीकार करें। आप महान हैं और आपकी राजनीतिक क्षमता और दूरदृष्टि के आगे कम से कम बिहार में सभी पानी भरते हैं। पर बिहार फिर भी गरीब है। मुझे पक्का विश्वास है कि आप भी इन हालातों से खुश न होंगे। चुनाव आयोग द्वारा छप्परा में 26.4.2004 को हुए चुनाव को स्थगित किए जाने पर टीवी संवाददाता द्वारा आपकी राय जानने पर आपकी प्रतिक्रिया देख रहा था। आप बहुत खीझे हुए और नाखुश दिखाई दिए। यह आप और आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है। आप अभी भी बिहार के ऋणी हैं। आप को यह ऋण बिहार से निकलने से पहले ही चुका देना चाहिए। मैं बिहार के शुभ चिंतकों में से एक हूँ। मैं इस बात की बहुत इज्जत करता हूँ कि कैसे आप कुछ नहीं से चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक की गद्दी पर पहुंचे। आप राजनीति में घुस कर नेता बनने वालों के लिए बहुत बड़ा उदाहरण हैं, और अपने आप में आने वाले कई सालों के लिए राजनीति प्रबधन के छात्रों के लिए शोध का विषय रहेगे। अब राबड़ी जी के बिहार के मुख्यमंत्री और शायद सोनिया जी के भारत के प्रधानमंत्री होने, पर आप अपने आप को बिहार की उन्नति कार्य में लगा कर इतिहास में अपनी जगह बना सकते हैं। कृप्या अपना अभियान व शैली बदलें, कुछ वैसी ही जैसे अशोक ने कलिंग की लड़ाई से बाद किया था। दिल्ली भूलिए और बिहार पर ध्यान दीजिए।</p>
<p>आप की नेतृत्व क्षमता सराहनीय है जो कि आप को इन योजनाओं को सफल बनाने के लिए अपने आदमियों जो कि आप को पूजते हैं को प्रयोग करने में काम आएगी। बस केवल दो साल के लिए बिहार की उन्नति व विकास पर ध्यान दें। बिहार से बाहर बसे बिहारी बड़ी लज्जा महसूस करते हैं जब वे बिहार के पिछड़ेपन, गरीबी, बढ़ते हुए अपहरण, दिन दिहाड़े हत्यायें, कानून व ब्यवस्था(सभी बेरोजगारी की वजह से), सड़कों कि घटिया हालत, आधुनिक उद्योगों की कमी या शिक्षा एवं स्वास्थ्य की कहानियां सुनते हैं। इस महान देश के <strike>विनीत दास</strike>विनम्र सेवक और बिहार के अपने पुत्र के कुछ सुझाव हैं</p>
<p>•	कृप्या अपने कार्यक्रमों को स्थानीय साधनों के प्रयोग पर ही आधारित रखें। एक बार पहल तो कीजिए सहयोग के लिए बहुत लोग आगे आ जाएंगे।<br />
•	हर ब्लॉक मे कोऑप्रेटिव धंधे की तरह एक डेयरी इकाई और ज्यादा से ज्यादा गाँवों में दूध इक्कठा करने के केंद्र लगाइए। मतलब कि बिहार में श्वेत क्रांति ले आइए। आपका ग्रामीण परिवेश इसमें सार्थक लोगों को लाने में सहायक होगा। इस कार्यक्रम से हर परिवार को कुछ और आमदनी होगी। गुजरात वाले प्रसिद्ध डाक्टर कूरियन भी हमारे बीच हैं। आप को उन से मिलना चाहिए और उनका योगदान मांगना चाहिए। आपकी प्रसिद्ध(अच्छी या बुरी) किसी को भी अपने साथ काम करने के लिए मना सकती है। वे आपके साथ इस कार्यक्रम के लिए कोई लगनवाला प्रबंधक या टैक्नोक्रैट लगा देंगे और आप इस कार्यक्रम को सफलता पूर्वक पूरा कर सकते हैं<br />
•	कृप्या किसानों को सब्जियाँ और हो सके तो फल लगाने के लिए प्रेरित कीजिए। इन फल-सब्जियों की आवाजाही की साधन, शीत भंडार, मार्कटिंग और निर्यात के साधन उपलब्ध कराइए। गांवों में लोगों की घटती जमीनों के चलते यह उपयुक्त रहेगा। किसानों में इससे खुशहाली आएगी और वह साल में ज्यादा समय व्यस्त रहेंगे। साथ ही सभी गाँवों में व्यवसायिक पेड़ लगाने पर जोर दीजिए।<br />
•	अपने चहेतों को अपना सारा ध्यान पशुपालन में लगाने के लिए कहिए – अच्छी नसल की गाएं, भैंसे, बकरियाँ और भेड़ें बिहार में लाईए। और भी बहुत क्षेत्रों के साथ साथ यह क्षेत्र भी उपेक्षति पड़ा है, इस कारण से पशुओं की कमी हो गई है। साथ ही मुर्गी पालन व सुअऱ पालन को भी बढ़ावा दीजिए। फिर से, इस से ग्रामीण भाईयों के लिए रोजगार बढ़ेगा, चमड़ा उद्योग का भी कल्याण होगा और मांसाहारी जनता को खुराक मिलेगी। गाँवो के मुखियो को मौजूदा पानी की टैंकियां नए करने के लिए प्रेरित कीजिए। यह कृषि एवं मतस्यपालन के लिए पानी इक्कठा करने में मदद करेगा।<br />
•	आप को निर्धारित पैसों को उमदा किस्म की सड़के बनाने के प्रयोग में लाइए ताकि गाँवों को अच्छे से अच्छे तरीके से आपस में जोड़ा जा सके। मुझे इन सब के अनगिनत लाभ बताने की आवश्यकता नहीं है बस यह समझ लीजिए की गाँवो की उपज खरीदने वाले गाँव ही पहुँच जाँएगे। इन सड़को के रख-रखाव की जिम्मेवारी गाँवों के मुखियों को ही दे दे अन्यथा हो सकता है कि वही इन्हें नुकसान पहुंचा दें।<br />
•	पंचायतों को 2-3 गाँवो का मिल कर साप्ताहिक बाजार लगाने के लिए प्रेरित करें इससे कम पैसे वालों को अपनी उपज बेचने का मौका मिलेगा।<br />
•	स्थानीय कला और कलाकारों को बढ़ावा दें जैसे कि मधुबनी की छपाई औऱ भागलपुर का रेशम। मेरे विचार से यहाँ काफी सुशुप्त लियाकत छुपी है।<br />
•       पर्यटन स्थलों की महत्ता को और बढ़ाइए – जैसे की सासाराम, गया, बुद्धगया, वैशाली इत्यादि। यह तो साधारण सी बात है कि यदि पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तो उस क्षेत्र की रोजगारी और खुशहाली बढ़ेगी।<br />
•     व्यवसायी लोगों को अन्य प्रातों की तरह प्रबंधन, तकनीकी और उच्च शिक्षा के केंद्र लगाने के लिए प्रेरित करें।<br />
हर गाँव में एक जन शौचालय बनवाईए। यह आवश्यक है। देसी खाद बनाने की जगहों का विकास करें और इनके प्रयोग को बढ़ावा दें।</p>
<p>और हाँ, कुछ और बातें&#8230;</p>
<p>बिहार के लोगों को अपनी जाति से अपनी पहचान रोकनी होगी। गर हिंदुत्व इस देश को तोड़ रहा है, को जाति आधारित राजनीति समाज में जहर घोल रही है। आप ही ऐसा कर सकते हैं और लोगों को अच्छा नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं। आइए लोगों की सोच बदलने की तरफ कार्य करें ताकि लोग अनजान आदमी से मिलने पर उसका नाम पूछें नकि “कौन जात से हो” आइए कुछ नौजवानों का अनुसरण करें जोकि अपनी कुलनाम अपने नाम से हटा रहें हैं।</p>
<p>• और आखिर में कृप्या दो और हो सके तो एक बच्चे वाले छोटे परिवार के फायदों को फैलाइए। बिमारु राज्यों में इस बात के प्रथम बनिए और केरल या तमिलनाडु की तरह बनें। मैं मानता हूँ कि हो सकता है यह आप के लिए कठिन हो। पर आप की एक बेटी आप की तरफ से इस कार्य को पूरा कर सकती है।</p>
<p>मैं इस सूची में और भी बहुत जोड़े सकता हूँ। पर आप बहुत समझदार और क्रियाशील हैं व बेरोजगारी की समस्या खास कर गाँवों में को दूर करने के और भी उपाय बूझ सकते हैं। कृप्या बिहार को अगले दो सालों में बदल दें। किसी भी परिवार के सबसे बड़े अभिशाप गरीबी तो जड़ से मिटाने के लिए आप उत्साह के साथ आगे तो बढ़ें साथ देने के लिए बहुत हाथ आगे आ जाएंगे। मैं आशा करता हूँ कि आप मेरे द्वारा यहां लिखी गई बातों को करने में निहित फायदों को पहचानेंगे। आपको शुभकामनाए और भगवान आपका साथ दे।</p>
<p>~ बिहार का एक विनम्र बेटा (<a href="http://www.drishtikona.com/aboutme.php">इंद्र शर्मा</a>)</p>
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