मेरे दोस्त गुरु का तीन बजे फोन आया कि गुरु देखने चलना है क्या? हम लोग काफी दिन से इसके विज्ञापन देख रहे थे व देखने का मन बना चुके थे कि भाई इसके लिए दस डॉलर खरचने ही हैं। बिना समीक्षाएं पढ़े देखने गए गुरु को। यहाँ बे-एरिया के ट्रैफिक के वजह से १५ मिनट लेट पहुँचे।
पर गुरु से जितनी उम्मीदें थी उससे भी अच्छी निकली। गुरुकांत देसाई व सुजाता वाकई कमाल के किरदार बनाएं हैं। गुरु जिसने न सुनना नहीं सीखा। धंधे की इतनी समझ की सारी दुनिया से अलग जा सकने की कुवत। दुनिया सूत खरीद रही है तो हम केला सिल्क बनाएंगे। बनिया बुद्धि ऐसी कि आवाज भी बचा कर खर्चते हैं। रास्ते में सरकार के दकियानूसी कानून व लाईसेंस भी आएं तो सरकार से भी पंगा ले सकने का साहस। वहीं सुजाता हर कदम पर पति के साथ। सुःख दुःख हर कदम पर साथ साथ। समझ इतनी कि अगर मायके वाले गलत जाएं तो उन्हें गलत कहना।
एक अच्छी फिल्म बड़े पर्दे पर ही देखें।
6 Responses
समीर लाल
January 13th, 2007 at 2:31 pm
1पंकज भाई
कल ही जा रहा हूँ देखने. अब तो आपकी फाइनल मोहर भी लग गई.
ravindra
January 13th, 2007 at 3:34 pm
2Ticke available nahi hai bhai ji. man to hamara bhi tha ki GURU dekhi jaye, halanki umeeden nahi ke barabar hain abhishek GURU se. Haan mani ratnam ke naam par ab bhi ticket khareede ja sakte hain….DHOOM2 ki tarah ye bhi latak hi na jaye. Apki sameeksha se aur bhadka diya hai, ab kahin bhi mil jaye, dkeh kar hi manenge……
Jitu
January 13th, 2007 at 8:45 pm
3अब गुरु (मिर्ची सेठ) ने बोल दिया है तो देखना ही पड़ेगा।
जिस फिल्म ने मिर्चीसेठ के अज्ञातवास को तोड़ा हो तो, वो निसन्देह ही बहुत शानदार होगी।
हम भी जईबे, इसी वीकेन्ड।
प्रभाकर पाण्डेय
January 13th, 2007 at 9:03 pm
4अच्छी जानकारी गुरु के बारे में ।
Amit Gupta
January 14th, 2007 at 5:26 am
5चलो अपन भी देख आएँगे और फ़िर अपने विचार अपने ब्लॉगर पर ही लिखेंगे।
श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'
January 14th, 2007 at 5:26 pm
6अज्ञानवास से वापस स्वागत है पँकज जी, उम्मीद है आप दुबारा चिट्ठाजगत में सक्रिय होंगे। आपके पीछे ‘अक्षरग्राम’ परिवार उदासीन सा हो गया था। ‘सर्वज्ञ’ महाशय खासकर आपके अलावा किसी की नहीं मानते। चौपाल भी सूनी पड़ गई है।
सर्वज्ञ पर पेज संपादन में मुश्किल आ रही है। उस संबंध में ईमेल आपको फॉरवर्ड करता हूँ।
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