चिट्ठों की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है उनका अनौपचारिकता का लेखन। लिखते हुए भाई लोगों को इस बात की चिन्ता नहीं रहती कि सुन्दर लिख रहा हूँ कि नहीं। कहीं कुछ नियमों के बाहिर तो नहीं लिख दिया। कहीं संपादक की कैंची ज्यादा तो नहीं चल जाएगी मेरे लेख पर। लेख छपेगा भी नहीं। अपने मन के मालिक हम खुद। जब छपास पीड़ा हुई, चाहे अमित की २४x७ की रूटीन हो या कालीचरण गॉड के बारह बजे, बस कभी भी ब्लॉगर या फिर वर्डप्रैस पर जाकर कीबोर्ड की चटक चटक चटाकाई और एक ठौ बढ़िया वाला लेख अंतर्जाल पर आपके नाम से आपकी दूकान में प्रकाशित हो गया। ब्लॉगविधा के बिना नारद कुवैत में बैठे बैठे अपनी नई किताब कहाँ छापते। वैश्विक गणतंत्र का इसे बड़ा उदाहरण क्या होगा।
पर इससे हटकर कभी कभी फॉरमल लेखन का प्रयास किया तो पाया कि ससुरा बहुतै ही मुश्किल है। निरंतर के समय इस का अहसास हुआ था व समझ में आया था कि भाई चिट्ठे लिख कर ज्यादा मत उछलो लिखनें के अभी और भी मूकाम बाकी हैं। यदि आप चिट्ठाकार बंधूओं में अच्छे लेखन के उदाहरण देखना चाहते हैं तो देश दुनिया मेरा सबसे प्रिय ब्लॉग है। रमण जी कि गज़ल का सिर पैर ब्लॉग व फॉरमल लेखन के सुरुचिपूर्ण मिश्रण का सुंदर प्रयास है। यह सब मैं क्यूँ लिख रहा हूँ। अरे यार पिछले दो घंटे से में अक्षरग्राम पर एक प्रविष्टि लिखी काफी अच्छा लगा पर टाईम ज्यादा लगता है। दुःखता है। और इस वाली की लिखने में पंद्रह मिनट लगे।
यानि कि ब्लॉग वार्ता हैं जबकि मैगजीन जैसे लेख भाषण। क्या कहते हो बंधू।
4 Responses
अनूप शुक्ला
April 9th, 2006 at 6:18 pm
1ब्लाग लेखन एक तरह का ड्राफ्ट लेखन है। भाषण वाले लेख पढ़ने के बाद टिप्पणी करने
के बारे में सोचना पढ़ता है। ब्लाग पर कुछ टिप्पणी लिखने के लिये सोचना नहीं पढ़ता है।
ब्लाग आपसी बातचीत की तरह अनौपचारिक मामला है।भाषण लिखने तथा पढ़ने के लिये
भी बहुत सोचना पढ़ता है।दुनिया में वैसे भी बातचीत की बहुतायत है भाषण कम दिये जाते हैं।
pankaj
April 9th, 2006 at 6:26 pm
2तो मतलब यह हुआ कि आपको चुनना पड़ेगा कि आप बातचीत करना चाहते हैं या फिर कुछ भारी कहना चाहते हैं। कुछ बीच का रास्ता भी होना चाहिए।
विनोद मिश्रा
April 11th, 2006 at 12:40 am
3ठीक नीचे वाली प्रविष्टी इस बात को और अछ्छी तरह से कहती है
ब्लाग हमारे दिमाग का कूड़ा संग्रह करने का एक उत्तम स्थान है
परिचर्चा - चर्चाओं का गढ़ at मिर्ची सेठ
May 13th, 2006 at 11:30 am
4[...] अंतर्जाल पर हिन्दी का प्रसार पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। जहाँ आज से दो-तीन साल उंगलियों पर गिने जा सकने वाले हिन्दी सजाल थे वहीं आज यह संख्या सैंकड़ों में होगी। इस प्रसार में ब्लॉग-विधा का बहुत बड़ा हाथ है। सजाल पर हिन्दी पढ़ने लिखने व संबधित विषयों पर वार्ता के लिए बहुत से माध्यमों का प्रयास किया जा चुका है। इसी श्रंख्ला में एक और कदम है परिचर्चा। हिन्दी प्रेमियों का उत्साह इसी बात से नजर आता है कि गृह-प्रवेश यानि कि लाइव होने के तीन दिन के अंदर ही इस पर 40 के करीब प्रयोक्ता व लगभग 200 प्रविष्टियां की जा चुकी है। इसे बनाने में कभी न सोने वाले अमित व हर दिल अजीज जीतू जी के प्रयत्न लगे हैं। इस के लिए उन्हें धन्यवाद व बधाई। [...]
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