आज एक दोस्त से बात करते हुए एक और दोस्त राहुल का जिकर् आन पड़ा उसका ब्लॉग जाकर पढ़ना शुरु किया तो पता लगा कि भैया को गज़लों का शौक हो आया है। अब इसे छड़ेपन की निशानी माने या परिपक्वता की तो पता नहीं। पर राहुल काफी सही शेरों के बारे में लिखते हैं। अब गालिब का यह वाला शेर ही लीजिए
ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता
मन से अपने अपने आप ही वाह वाह निकलता है। कतई Cognito Ergo Sum या फिर बुल्ले शाह कि बुल्ला की जाणा मैं कौन वाली भावनाएं हैं। है न अजीब की अलग अलग समय पर अलग अलग लोगों को एक ही तरह की बातों का इहलाम होना।
One Response
आलोक
March 5th, 2006 at 8:09 pm
1हाँ, हर पीढ़ी में इंसान यही सब सोचता है, कुछ ख़ास इलहाम हो नहीं पाता।
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