जिंदगी में बहुत सारी चीजें होती है जिन्हें आप मान लेते हो कि ये तो ऐसे ही होता होगा। पर उसके पीछे लंबी कहानी छिपी हो सकती है ध्यान नहीं आता। जब से काम शुरु किया एक क्यूब में ही काम करते आए हैं। कन्सलटिंग के रहते दूसरों से जरा ज्यादा क्यूबों में ही काम किया होगा। प्रायः क्यूबों से घृणा ही की जाती है व क्यूब डवैलर, क्यूब फारम जैसे शब्द भी चलते हैं। पर कभी नहीं सोचा था कि इस के पीछे भी कहानी होगी। आज पढ़ा तो पता चला कि इसे बनाने वाले यह सोचते मरा कि क्या बना दिया। आप भी पढ़ें फार्च्यून की इस कड़ी पर।
साभार: जेफ नोलन
2 Responses
kali
March 25th, 2006 at 5:53 am
1yup that was an interesting strory. Somehow i never felt anything bad about cubicles, i actually prefer them to office. Give ample distractions as long as they are 4 people cubicles with enough space that you are not rubbing elbows with anyone.
आशिष वशिष्ठ
April 4th, 2006 at 6:28 pm
2नरुला जी, क्यूबिकल कि कहानी तो स्कॉट एडम से पुछे। आज कल उनकी ‘डिलबर्ट प्रीन्सीपल’ का मज़ा ले रहे हैं।
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