१९४४ में लंदन युनिवर्सटी की ग्रेजूएट होती क्लास को दिए गए व्याख्यान में सी एस लुईस ने एक अंदर के छल्ले की बात की थी। उनके अनुसार हर ग्रुप, समाज, पार्टी में एक अंदर का छल्ला (अंग्रेजी में इन्नर रिंग) होता है और इस छल्ले से जुड़ने की, इस में होने की चाह सभी में हद से बढ़कर होती है। स्कूल में यह स्मार्ट समझे जाने वाले छात्रों के ग्रुप से जुड़ने का, ऑफिस में बॉस लोगों की संगति का या मुम्बई में यश चोपड़ा, सुभाष घई की पार्टी में जाने का लोभ हो सकता है।
इस बात को लिखने के पीछे मेरा कारण था हिन्दी चिट्ठाकार ग्रुप में हुई कुछ समय पहले की चर्चा। चर्चा का विषय था कि लोग बाग टीवी इत्यादि पर साक्षात्तकार देते समय अंग्रेजी में बात करना क्यूँ शुरु कर देते हैं। तो भाई यह अंदर की बात न होकर अंदर के छल्ले की बात है। अंग्रेजों कि समय में वे लोग सर पर बैठे थे तो सबसे बड़े वही हुए। तो उस छल्ले में घुसने की पहली शर्त यह की अंग्रेजी आती हो। आजादी के बाद जिन लोगों के हाथ में बागडोर आई वे पहले से माने के बैठे थे संभ्रात लोग तो अंग्रेजी में ही बात करते हैं। ये तो आम जनता जो कि हमारे वाले छल्ले में पक्का नहीं है जो हिन्दी, पंजाबी, तमिल में बात करती है। बस वहीं से शुरु यह बात अब मानसिकता बन चुकी है कि अगर एक आदमी हिन्दी में बात कर रहा है तो उस पक्का अंग्रेजी नही आती। जिसे अंग्रेजी नहीं आती वह पक्का गंवार है।
पर अपना मानना है कि अब चाहे इसे इतिहास की दुर्घटना कहें या भगवान की मर्जी अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा बन चुकी है। इसलिए सीखनी जरुर चाहिए। मेरे धंधे में मैं लगभग हर राष्ट्र के लोगों से बात करता हूँ और बात कराती है अंग्रेजी। हम लोगों में विरला ही होगा जो यह कहे कि वह अपने बच्चों को तो केवल हिन्दी या अन्य भाषा ही सीखाएगा।
3 Responses
eswami
March 18th, 2006 at 2:06 pm
1सहमत हूं! अब अगली व्यावसायिक दिक्कत, मतलब जब हर एक को अंग्रेजी आती हो तो अंदर के छल्ले में घुसने में अगले स्तर की दिक्कतें आती हैं. रंग/संस्कृति/ज्ञान/कौशल के परे भी कुछ है जो चाहिए होता है! इसी विषय मे पढी इस किताब की याद आ गई आपकी ये प्रविष्ठी पढ कर.
pankaj
March 18th, 2006 at 2:10 pm
2बहुत बढ़िया। स्वामी दादा – पुस्तक के बारे में बताने के लिए शुक्रिया। अमेजन पर तो इसकी बहुत तारीफ पढ़ी है। पुस्तकों की लाइन – http://akshargram.com/ketali/bookmarks.php/pankaj/books में इसे शामिल कर लिया है।
पंकज
Anunad
March 19th, 2006 at 7:54 am
3शायद अन्तिम अनुच्छेद लिखने में आपने थोडा “शार्टकट” मार दिया है |
ये कहना तो सही है कि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अंगरेजी जानने से प्राप्त सुविधा विश्व की कोई दूसरी भाषा जानने से हुए फायदे की अपेक्षा अधिक है ; लेकिन ये कहना बिल्कुल गलत है कि अंगरेजी जानने से “सब जगह” काम निकल जाता है | उदाहरणार्थ, जिनेवा जैसे अन्तर्राष्ट्रीय नगर में अंगरेजी जानते हुए भी हमको कुछ पूछने पर कोई सन्तोषजनक समाधान नही मिल पाता है | इसी तरह अंगरेजी जानने और सीखने का कोई विरोध नही है ; विरोध उसके गलत जगह और गलत इरादे से किये गये उपयोग से है , अंगरेजी को शोषण के एक अदृश्य हथियार की तरह प्रयोग करने से है |
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