पिछले कुछ सालों में मुझे सहित सभी दोस्तों की या तो शादियां हो गई या फिर मँगनियाँ | कुछ वीर बालक बचे हैं लेकिन वे भी जल्दी ही करने की फिराक में हैं | हम सभी की उम्र २६ से ३० के बीच में ही है | जिन दोस्तों की अभी शादी नहीं हूई है अगर उन से बात करो तो पता चलता है कि लगभग सभी के घरों से दबाव है कि बेटा आप की उम्र निकली जा रही है | लड़कियों के लिए तो यह एक और भी बड़ा प्रश्न है | यह सब देखते हुए मेरे मन में ख्याल आया कि क्या अमरीकी भाई भी कभी इस प्रकार के दबाव से जूझते है |
सहकरमी स्टीव से इस बारें में चर्चा हो गई | स्टीव के कथनानुसार अमरीका में माँ बाप कुछ ज्यादा दबाव नही डालते इन मामलों में | आदमी को जब अच्छा लगे वह शादी कर सकता है | व्यक्तिगत तौर पर तो यह अच्छा है | लेकिन अगर आदमी की सारी जिन्दगी को देखें तो शायद थोड़ा अलग सोचने के लिए विवश हो जांए | अब आदमी सारी जिन्दगी तो जवान नही रहता | तो अगर ये मान लें कि आदमी शादी करेगा व बच्चे पैदा कर के उन से प्यार व फिर उन्हें स्थापित होने की चिंता भी करेगा | या संक्षेप में एक आम आदमी |
तो सोचा जाए कि वैदिक रीति रिवाज शायद यही सोच कर बनाए गए होंगे | आदमी की जिंदगी को ४ आश्रमों में बांटा गया है | पहले २५ साल पढ़ाई | फिर अगले २५ वर्ष शादी, बच्चे, धनोपार्जन | और जब आप ५०-६० के हुए आप के बच्चे स्थापित हो चुके होंगे | फिर अगले २५ साल समाज के एवं आखिर में वनवास | अब समाज में आदमी के जीवन को इस प्रकार से बाँटना कितनी दूर की सोच है | शायद यही संस्कार पीढ़ियों से भारतीय समाज में समा चुके हैं | shaadi.com , bharatmatrimony.com का इतना नाम शायद इसी वजह से है | केबल के आगमन के बाद लोगो के विचार बदल तो रहें हैं और हम भी पश्चिमी सभयता में ढ़ल रहे हैं | लेकिन इस संगम से आने वाला समाज कैसा होगा यह तो कल ही बताएगा |
यह एक पुरानी प्रविष्टि है व नारद पर चल रहे बदलावों की जाँच हेतु रिपैकेज की जा रही है। साथ ही खाली बैठे बैठ मिर्ची सेठ की फोटू भी बना दी
One Response
अनूप शुक्ला
November 14th, 2005 at 10:44 am
1सेठजी, सच तो यह है कि हम अपने तमाम स्वत:स्फूर्त मनोभाव
स्थगित करते रहते हैं। बेटा पढ़ लो तब खेलना। नौकरी लग जाये तब
मस्ती करना। कमा लो अच्छी तरह तब शादी करना। कुछ दिन ऐश
कर लें तब बच्चे। अभी आफिस में हैं इसलिये हंसनही पा रहे हैं। घर में
हैं इसलिये रो नहीं पा रहे हैं। अभी काम बहुत है इसलिये लिखनहीं पा
रहे हैं। फुरसत में हैं इसलिये कुछ सोच नहीं पा रहे हैं। आदि-इत्यादि। वगैरह-वगैरह।
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