हाँ भाई के नए प्रारुप की घोषणा करते समय मैंने हैडर में दी गई छवि के बारे में पूछा था। जिसे पर की देबाशीष ने पारखी नजर का परिचय देते हुए सही जवाब दिया था कि “रे भाई, जे तो म्हारे को मंगल ग्रह के फोटू लागे हैं। रंग भी बड़ा जँचे है, मिर्ची सा [...]
भई अगर देस में सबसे बड़ी गीकों की फौज ढूँढनी हो तो शायद टी सी एस के पास सबसे ज्यादा जवान होंगे। देस में कम्पयूटर संबधित काम की खासियत ये भी है कि ज्यादातर काम बाहरी देशों का होता है। अमरीका के लिए सर्वाधिक। अब बाहरी ग्राहकों का सारा काम देस से बैठ कर तो [...]
गाहे बगाहे मन्दिर जाना तो हो ही जाता है। सैन डिएगो मे श्री मन्दिर है भी बिल्कुल सही जगह पर। सारी देसी दुकानों के साथ मन्दिर भी है, तो आदमी दाल रोटी खरीदता, हिन्दी फिल्म की कैस्ट लेते हुए भगवान का नाम भी ले लेता है। मंदिर की जगह की ऊपयुक्ता की देस से तुलना [...]
जैसा कि अपेक्षित था हाँ भाई 2.0 अपने वर्डप्रैस प्रारूप में हाजिर है। इसका नमूना सदीश बालसुब्रमन्यम जी के एक नमूने पर आधारित है। देबाशीष जी की नए पड़ाव बताई गई हिन्दी चिट्ठों की ओ.पी.एम.एल की फाईल से कड़ियाँ बड़ी आसानी से आयात हो गई। मुझे हैडर के चित्र पर थोड़ा बहुत गर्व है यदि [...]
जब पहली बार लुईविल में कदम रखे थे तो लगा था कि अमरीका की धूप देस से ज्यादा तेज है। कुछ चुभती सी है। अंदेशा तो मेरे को पहले से ही था पर स्लैशडॉट पर न्यूयार्क टाईम्स का यह लेख पढ़ कर विश्वास हो गया कि प्रदूषण ही इस बात का जिम्मेवार है। अच्छा है [...]
कुछ समय पहले ब्रिज जी ने सांता क्लारा लाएब्रेरी के बारे में लिखा और अपने पुस्ताकालय प्रेम से भी अवगत कराया। उनकी इस प्रविष्टि से बचपन की कुछ बातें यादें स्मरण हो आई। पुस्तकों से लगाव मुझे बचपन से हो गया था। मेरे बड़े दीदी ने शायद तीसरी कक्षा में मुझे मेरी पहली कामिक्स, अमर [...]
आपने देखा होगा कि मेरी ब्लॉग-गतिविधि काफी कम हो गई है। तो सर जी बात ये थी कि व्यक्तिगत जिंदगी से जुड़ी बातों के लिए हाँ भाई या अक्षरग्राम काफी था लेकिन काम वाली जिंदगी के बारे में यहाँ लिखने में कठिनाई होती थी। उस मोर्चे के लिए हमहुँ अंग्रेजी चिट्ठा “Beta Thoughts” खोले हैं। [...]