अब जब कि हाँ भाई अपने स्थाई पते पर पहुँच चुके है – यहाँ पर इनके पलायन की ज़रूरत के बारे में लिख रहा हूँ । साथ ही हिन्दी चिट्ठा बनाते समय उपलब्ध विकल्पों एवं लिए गए निर्णयों पर भी चर्चा करूँगा। ऐसा लिखने के पीछे मंशा यह है कि शायद यह जानकारी भद्रजनों के काम आए। [...]
हाँ भाई के नए घर में आपका स्वागत है। मुझे नया घर बहुत मनभावन लगा । आप को कैसा लगा बतावें। कहीं पर ईंट-गारे में कुछ कमी रह गई हो तो अवगत कराएं। आप सभी के लिए एक और सूचना – मैंने हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए एक सामूहिक चिट्ठे “अक्षरग्राम” का स्थापन किया है। यहाँ [...]
भाईयो आपका उत्साह देखकर मन अति आन्दित हुआ । साथ ही प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद । ज्ञात हुआ कि विनय जी भी हाँ भाई कहते हैं अर्थात पढ़ते हैं। उन्हीं की टिप्पणी से Google, MS-Office, Windows XP और अब Movable Type. कमाल के दिन हैं.. ऐसे ही नित नए काम होते रहें और कम्पयूटर पर [...]
सज्जनों आखिर मूवेबल टाईप के अनुवाद का पहला ड्राफ्ट तैयार हो ही गया । यहाँ से लीजिए । यदि आप इसकी समीक्षा कर अपनें विचार एवं टिप्पणी कर सकें आपकी अति कृपा होगी। कृप्या ध्यान रखें यह utf-8 में कूटबंधित है।
याद नहीं चिट्ठाकारी की दुनिया में कदम कैसे रखे । शायद जॉन ऊडॅल का रेडिया मैंने सबसे पहले पढ़ा होगा । जावा से रोज़ी रोटी चलती है, इसलिए jroller.com पढ़ना शुरू हो गया । वहाँ एक ब्लॉग towards more light… लिखना आरंभ किया लेकिन वहाँ पूर्णतयः जावा केंद्रित होने के कारण निरंतरता नहीं बन पाई [...]
यदि आप खबरें ध्यान से पढ़ते हैं तो आपने देखा होगा कि इंडिया ने पहले शाईन करना शुरू किया और फिर भारत का उदय हुआ । सच में कभी कभी लगता है इंडिया वाले भारत वालों से अलग ही हैं । अब खबरों को ही लिजिए उन्हें (इंडिया वालो को) लगता है भारत की जनता [...]
आज सहकर्मी जॉन काम पर अपने बाग से कुछ संतरे लाए एवं फलों पर चर्चा शुरू हो गई । बातों ही बातों में बात निकली की भारत में कौन सा फल ज्यादा मिलता है । फिर तो मैं ने जो आम्र कथा प्रारंभ की पुरे 20 मिनट चली । सही में देस के आम बहुत [...]
दोस्तो पंजाबी होने के बहुत लाभ हैं । अब चाहे यह अच्छा है या बुरा, दुनिया में पंजाबी हर जगह मिल जाते हैं । शायद वैसे ही जैसे आलू सब जगह मिल जाते हैं । मेरा काम के सिलसिले में बहुत से शहरों में जाना हो जाता है और जिन्हें देसी खाना अच्छा लगता हो [...]
स्टीफानो (कोकून के रचयिता) हैं ने अपने चिट्ठे से – “Getting to Yes”, जो कि एक पुस्तक है के संक्षेप पर निर्देशित किया । संक्षेप काफी पंसद आया सोचा चलो इसका हिन्दी अनुवाद करते हैं । अनुवाद सोच से अधिक कठिन निकला । बहरहाल पेश है अनुवाद की पहली कड़ी हाँ कहलवाना – मोलभाव बिना [...]
एक बार देवदास की पारो ने अपने देव से कहा था और आज मैंने अपने आप से कह दिया कि “पंकज बाबू ! तुमि तो एक दम बोका..” अरे मैं भी कितना बुढ़भक्क निकला,जो चीज़ मेरे पास शुरु से है उसके लिए अन्यथा ही इधर उधर पूछता फिर रहा हूँ । तो सुनिये मेरे faux [...]